शासन, युवा संवाद और व्यवस्था सुधार

- चन्द्रकांत खुंटे क्रांति
किसी भी लोकतांत्रिक राष्ट्र की असली शक्ति उसका युवा वर्ग होता है। युवा देश के भविष्य के निर्माता, नवप्रवर्तनक और ऊर्जा के स्रोत होते हैं। वर्तमान समय में भारत सहित दुनिया के कई हिस्सों में युवाओं के बीच असंतोष की भावना देखी जा रही है। जब युवा अपनी मांगों और अधिकारों के लिए सड़कों पर उतरते हैं, तो शासन (प्रशासन) द्वारा बल प्रयोग या हिंसा का रास्ता अपनाना किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। लोकतंत्र की मूल भावना संवाद और संवेदनशीलता में निहित है। शासन को बल प्रयोग के बजाय युवाओं के साथ बैठकर उनकी समस्याओं को सुनना चाहिए और विशेष रूप से शिक्षा तथा रोजगार के क्षेत्र में फैले भ्रष्टाचार पर कड़ा नियंत्रण लगाना चाहिए।

हिंसा कभी भी किसी समस्या का स्थायी समाधान नहीं हो सकती। जब राज्य अपनी ही जनता, विशेषकर युवाओं पर लाठीचार्ज, आंसू गैस या दमनकारी नीतियों का उपयोग करता है, तो समाज में अविश्वास की खाई और गहरी हो जाती है। बल प्रयोग से युवाओं के मन में सरकार और प्रशासनिक व्यवस्था के प्रति गहरा असंतोष और विद्रोह की भावना जन्म लेती है। देश के युवाओं की रचनात्मक ऊर्जा जो राष्ट्र निर्माण में लगनी चाहिए, वह व्यवस्था के विरोध में नष्ट होने लगती है। एक स्वस्थ लोकतंत्र में शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन नागरिकों का मौलिक अधिकार है। इसे हिंसा से दबाना लोकतांत्रिक मर्यादाओं के विपरीत है।

आज के युवाओं की समस्याएं पुरानी पीढ़ियों से काफी अलग और जटिल हैं। शासन को ऊपर से नीचे शासन करने के बजाय सहभागितापूर्ण दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। सरकार को नियमित अंतराल पर युवा प्रतिनिधियों, छात्र संगठनों और नीति निर्माताओं के बीच सीधे संवाद के लिए युवा संसद या खुला मंच का आयोजन करना चाहिए। परीक्षाओं के बार-बार टलने, प्रश्नपत्र लीक होने और बेरोजगारी के कारण आज का युवा मानसिक अवसाद से जूझ रहा है। प्रशासन को उनकी इस पीड़ा को सहानुभूतिपूर्वक सुनना होगा, न कि उन्हें कानून-व्यवस्था की समस्या मानकर देखना होगा।

वर्तमान समय में सबसे बड़ी चिंता शिक्षा और रोजगार के क्षेत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार है। प्रश्नपत्र लीक करने वाले गिरोह, रिश्वतखोरी, और भाई-भतीजावाद ने पूरी चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता पर सवालिया निशान लगा दिया है। जब एक ईमानदार युवा सालों तक दिन-रात मेहनत करता है और अंत में पता चलता है कि परीक्षा का प्रश्नपत्र पहले ही बिक चुका था, तो उसका पूरी व्यवस्था से भरोसा उठ जाता है। यह भ्रष्टाचार न केवल योग्य उम्मीदवारों का हक मारता है, बल्कि अयोग्य लोगों को व्यवस्था में शामिल कर देश के भविष्य को भी कमजोर करता है।

इस गंभीर समस्या से निपटने के लिए शासन को तुरंत और कड़े कदम उठाने की आवश्यकता है। इसके लिए निम्नलिखित व्यावहारिक कदम अत्यंत महत्वपूर्ण हो सकते हैं:

प्रश्नपत्र लीक के खिलाफ सख्त और त्वरित कानून: प्रश्नपत्र लीक और परीक्षा में धांधली करने वाले गिरोहों के खिलाफ एक राष्ट्रीय स्तर का सख्त कानून होना चाहिए। अपराधियों की संपत्ति कुर्क करने, गैर-जमानती धाराएं लगाने और त्वरित अदालतों के माध्यम से छह महीने के भीतर सजा
सुनिश्चित करने का प्रावधान होना चाहिए।

पारदर्शी और आधुनिक परीक्षा प्रणाली: परीक्षाओं के आयोजन में मानवीय हस्तक्षेप को न्यूनतम किया जाना चाहिए। पूरी तरह से सुरक्षित, डिजिटल प्रणाली या अत्यधिक सुरक्षित कंप्यूटर-आधारित जांच को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। परीक्षा केंद्रों का चयन केवल सरकारी या अत्यधिक प्रतिष्ठित संस्थानों में ही हो, जहां गुप्त कैमरों की कड़ी निगरानी हो।

समयबद्ध भर्ती कार्यतालिका: हर राज्य और केंद्रीय भर्ती बोर्ड को वर्ष की शुरुआत में ही अपना एक निश्चित कैलेंडर जारी करना चाहिए। परीक्षा की तिथि, परिणाम की घोषणा और नियुक्ति का समय पहले से तय होना चाहिए। यदि किसी कारणवश परीक्षा टलती है, तो जवाबदेह अधिकारियों पर कार्रवाई होनी चाहिए।

स्वतंत्र और स्वायत्त जांच इकाइयां: भर्ती बोर्डों को राजनीतिक हस्तक्षेप से पूरी तरह मुक्त किया जाना चाहिए। इन बोर्डों में ईमानदार, पारदर्शी और तकनीक-प्रेमी अधिकारियों की नियुक्ति होनी चाहिए। किसी भी विसंगति की जांच के लिए एक स्वतंत्र भर्ती लोकपाल का गठन किया जाना चाहिए।
कौशल विकास और रोजगार के नए अवसर: पारंपरिक शिक्षा के साथ-साथ युवाओं को उद्योग जगत की मांग के अनुसार कौशल प्रदान किया जाना चाहिए। इसके साथ ही नए व्यवसायों और स्वरोजगार के लिए बिना किसी भ्रष्टाचार या लालफीताशाही के आसानी से ऋण और सरकारी मदद मिलनी चाहिए।
युवा किसी भी देश का वर्तमान और भविष्य होते हैं। उनकी जायज मांगों को दबाने के लिए बल प्रयोग करना एक बड़ी प्रशासनिक विफलता को दर्शाता है। शासन को लाठी और गोली का रास्ता छोड़कर टेबल पर बैठकर बात करने की मेज सजानी होगी। शिक्षा और रोजगार में फैले भ्रष्टाचार रूपी दीमक को खत्म किए बिना हम एक समृद्ध और विकसित भारत की कल्पना नहीं कर सकते। जब युवाओं को पारदर्शी व्यवस्था, समय पर रोजगार और सम्मानजनक व्यवहार मिलेगा, तो वे सड़कों पर आंदोलन करने के बजाय अपनी पूरी ऊर्जा देश को प्रगति के पथ पर ले जाने में लगाएंगे। संवाद ही लोकतंत्र की आत्मा है, और शासन को इसी मार्ग पर चलना चाहिए।
(जांजगीर-चाम्पा, छत्तीसगढ़)

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