राजीव त्यागी
तकनीक दौर में बुजुर्गों की परेशानी बढ़ रही है। लिहाजा समय की दरकार है कि डिजिटल सेवाओं का डिज़ाइन वरिष्ठ नागरिकों की जरूरतों के अनुरूप बनाया जाए। बैंकिंग व सरकारी एप अधिक सरल हों, बड़े वित्तीय लेनदेन में अतिरिक्त मानवीय सत्यापन की व्यवस्था हो तथा साइबर सुरक्षा को लेकर व्यापक जागरूकता अभियान चलाए जाएं।
तकनीक ने मानव जीवन की रफ्तार को अभूतपूर्व गति दी है। सुबह की चाय के डिजिटल भुगतान से लेकर हवाई टिकट और बैंकिंग तक, सब कुछ अब एक छोटी-सी स्क्रीन पर सिमट गया है। युवाओं के लिए यह सुविधा और अवसर का नया संसार है, लेकिन हमारे बुजुर्गों के लिए यही दुनिया कई बार उलझन, असुरक्षा और निर्भरता का कारण बन जाती है। अपनों से जुड़े रहने की खुशी और हर काम के डिजिटल होने की मजबूरी के बीच पुरानी पीढ़ी जिस संघर्ष से गुजर रही है, वह आज की एक बड़ी विडंबना बन गई है। स्मार्टफोन अब केवल युवाओं का उपकरण नहीं रहा। दादा-दादी वीडियो कॉल पर दूर बैठे अपने पोते-पोतियों को देखकर भावुक हो उठते हैं। व्हाट्सएप पर परिवार से जुड़े रहना, पुराने मित्रों को खोजना और यूट्यूब पर भजन सुनना उनके अकेलेपन को काफी हद तक कम करता है। लेकिन यही तकनीक कई बार उनके लिए परेशानी का कारण भी बन जाती है।
स्क्रीन पर दर्जनों एप, लगातार आने वाले संदेश, अचानक बदली हुई सेटिंग या किसी जरूरी फाइल के मिट जाने का डर उन्हें हमेशा असहज बनाए रखता है। छोटी-सी तकनीकी चूक भी उनका आत्मविश्वास डगमगा देती है। सबसे गंभीर चिंता साइबर ठगी का बढ़ता खतरा है। डिजिटल दुनिया की सीमित समझ का फायदा उठाकर अपराधी बुजुर्गों को सबसे आसान निशाना बना रहे हैं। फर्जी बैंक अधिकारी, पुलिसकर्मी या सरकारी कर्मचारी बनकर फोन करना अब आम बात हो गई है। 'डिजिटल अरेस्ट' जैसे नए साइबर अपराधों में ठग वीडियो कॉल के जरिए कानूनी कार्रवाई का डर दिखाकर वरिष्ठ नागरिकों से लाखों-करोड़ों रुपये ठग लेते हैं।
केवाईसी अपडेट, पेंशन बंद होने या बैंक खाते के सत्यापन के नाम पर ओटीपी और बैंक विवरण हासिल कर जीवनभर की जमा-पूंजी साफ कर दी जाती है। आर्थिक नुकसान उन्हें गहरा मानसिक आघात भी पहुंचाता है, जिससे कई बुजुर्ग अवसाद और असुरक्षा के शिकार हो जाते हैं। कई मामलों में ठगी के बाद वे खुद को दोषी मानने लगते हैं, परिवार के सामने अपनी बात रखने से हिचकिचाते हैं। स्थिति आर्थिक ही नहीं, भावनात्मक संकट भी पैदा करती है। अब डिजिटल जीवन प्रमाण की प्रक्रिया में बायोमेट्रिक सत्यापन जरूरी है। बढ़ती उम्र के साथ उंगलियों के निशान धुंधले पड़ जाने से कई बार सत्यापन सफल नहीं हो पाता।
ऐसे में उन्हें बार-बार सेवा केंद्रों के चक्कर लगाने पड़ते हैं। बैंकिंग भी अब पासबुक से आगे बढ़कर पासवर्ड, ओटीपी और मोबाइल एप पर निर्भर हो गई है। डिजिटल बदलाव का एक सामाजिक पहलू भी है। संयुक्त परिवारों के टूटने और युवाओं के रोजगार हेतु बाहर जाने से बुजुर्ग अकेले रह रहे हैं। ऐसे में मोबाइल और इंटरनेट अनिवार्य जरूरत बन गए हैं। जब उनके सामने तकनीकी समस्या आती है, तब अकेलापन व असहायता का एहसास गहरा हो जाता है। जरूरी है कि डिजिटल साक्षरता को केवल तकनीकी प्रशिक्षण नहीं, बल्कि सामाजिक सुरक्षा के रूप में भी देखेंं।





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