आंदोलन और मर्यादा
इलमा अज़ीम
जब किसी राष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था पर प्रश्नचिह्न लगते हैं, तब केवल विद्यार्थियों का भविष्य ही नहीं, बल्कि पूरे समाज का विश्वास भी प्रभावित होता है। दिल्ली के जंतर-मंतर पर हाल ही में छात्रों का आंदोलन इसी चिंता का प्रतीक था। प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक और पारदर्शिता को लेकर उठे सवालों ने हजारों युवाओं को सडक़ों पर उतरने के लिए विवश किया। यह आंदोलन केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं था, बल्कि उस व्यवस्था के प्रति असंतोष का प्रतीक था, जिस पर करोड़ों युवाओं के सपने टिके हैं।
शिक्षा किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी पूंजी होती है। यदि परीक्षा प्रणाली निष्पक्ष और विश्वसनीय न रहे, तो परिश्रम का मूल्य घट जाता है और प्रतिभा के स्थान पर भ्रष्टाचार तथा अव्यवस्था हावी होने लगती है। वर्षों तक कठिन परिश्रम करने वाले विद्यार्थियों के लिए पेपर लीक जैसी घटनाएं केवल एक प्रशासनिक विफलता नहीं, बल्कि उनके भविष्य पर सीधा आघात हैं। लोकतंत्र में सार्वजनिक पदों पर बैठे लोगों की जवाबदेही आवश्यक है। किंतु किसी एक व्यक्ति के पद छोड़ देने मात्र से समस्या का समाधान नहीं हो जाता। यदि परीक्षा प्रणाली की संरचनात्मक कमियां बनी रहती हैं, तो भविष्य में भी ऐसे संकट दोहराए जा सकते हैं।
आवश्यकता इस बात की है कि सरकार परीक्षा संचालन, प्रश्नपत्रों की सुरक्षा, डिजिटल निगरानी, साइबर सुरक्षा और दोषियों के विरुद्ध कठोर दंड जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत बनाए। युवा किसी भी राष्ट्र की सबसे बड़ी शक्ति होते हैं। भारत का इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब भी युवाओं ने सकारात्मक दिशा में आंदोलन किया, तब समाज और लोकतंत्र दोनों मजबूत हुए। विरोध करना प्रत्येक नागरिक का संवैधानिक अधिकार है, किंतु विरोध की भाषा और तरीका भी लोकतांत्रिक होना चाहिए। यदि आंदोलन में अशालीन भाषा, व्यक्तिगत आक्षेप या ऐसी अभिव्यक्तियां शामिल हो जाएं जो भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के विपरीत हों, तो आंदोलन का नैतिक प्रभाव कमजोर पडऩे लगता है। आंदोलन की शक्ति उसके शोर में नहीं, बल्कि उसके चरित्र, अनुशासन और उद्देश्य की स्पष्टता में निहित होती है।
विश्व के अनेक देशों में छात्र आंदोलनों ने लोकतांत्रिक परिवर्तन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। बहरहाल आज सबसे बड़ी आवश्यकता शिक्षा व्यवस्था में व्यापक सुधार की है। प्रश्नपत्रों की सुरक्षा के लिए आधुनिक तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित निगरानी, साइबर सुरक्षा, स्वतंत्र परीक्षा प्राधिकरण, नियमित ऑडिट तथा पेपर लीक जैसे अपराधों के लिए त्वरित और कठोर दंड व्यवस्था समय की मांग है। जो लोग लाखों विद्यार्थियों के भविष्य से खिलवाड़ करते हैं, उनके प्रति किसी प्रकार की नरमी पूरे समाज के साथ अन्याय होगी।





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