बिगड़ा अमरनाथ यात्रा का रूप, बदला बर्फानी बाबा का स्वरूप

​- सपना सी.पी. साहू 'स्वप्निल'

​सनातन धर्म में बाबा बर्फानी की अमरनाथ यात्रा का स्थान सर्वोपरि है। अनंत काल से यह दुर्गम यात्रा भक्तों की अडिग आस्था, आत्मिक शुद्धि और देवाधिदेव महादेव के प्रति अगाध श्रद्धा का प्रतीक रही है। भृंगु ऋषि की भृंगु संहिता में इसका माहात्म्य इस प्रकार वर्णित है—

​धन्यं तदम्बा-सदनं परं पदं, यत्रावभातीह स चामरेश्वरः।

यद्दर्शनान्मानुषदेहधारिणो, मुक्ता भवन्तीह न संशयोऽत्र वै।।

​अर्थात: वह पवित्र धाम (गुफा) परम पद को देने वाला है, जहां साक्षात् अमरेश्वर महादेव विराजमान हैं। इसके दर्शन मात्र से मनुष्य जन्म-मरण के बंधन से मुक्त हो जाता है।

​समुद्र तल से लगभग 3,888 मीटर की ऊंचाई पर स्थित पवित्र अमरनाथ गुफा में प्रतिवर्ष प्राकृतिक रूप से हिमशिवलिंग का निर्मित होना परात्परा शिव और प्रकृति स्वरूपा पार्वती जी का चमत्कार ही है। यह केवल एक धार्मिक यात्रा नहीं, बल्कि करोड़ों सनातनियों की आत्मा से जुड़ा जीवंत स्पंदन है। परंतु, हाल के वर्षों में—विशेषकर इस वर्ष 2026 की अमरनाथ यात्रा के दौरान—जिस प्रकार की प्रशासनिक लापरवाही, कुप्रबंध और कथित भ्रष्टाचार की तस्वीरें सामने आई हैं, उसने न केवल सच्चे भक्तों को आहत किया है, बल्कि बाबा बर्फानी के पवित्र स्वरूप के अस्तित्व पर भी प्रश्नचिह्न खड़ा कर दिया है।

​अमरनाथ गुफा में हिमशिवलिंग का निर्माण एक अनूठी प्राकृतिक और आध्यात्मिक प्रक्रिया है। सर्दियों के महीनों (विशेषतः नवंबर से फरवरी) में जब पूरी अमरनाथ घाटी भारी बर्फबारी होती है, तब वहां का तापमान शून्य से कई डिग्री नीचे पहुंच जाता है। इसके बाद मार्च और अप्रैल के महीनों में जब सुरक्षा बल (बीएसएफ व सीआरपीएफ) और प्रशासन के लोग मार्ग बहाली के लिए पहुंचते हैं, तब तक बाबा बर्फानी अपना प्रारंभिक ठोस स्वरूप ले चुके होते हैं। इसके बाद मई से जून के दौरान जब पहाड़ों पर जमी बर्फ हल्की पिघलती है, तो वह पानी गुफा की चूना पत्थर की चट्टानों से रिसकर बूंद-बूंद नीचे टपकता है। अत्यधिक ठंड के कारण यह पानी गिरते ही जमता जाता है और परत-दर-परत बढ़कर जून के अंत तक भव्य, स्वयंभू हिमशिवलिंग का रूप धारण कर लेता है।

​इस वर्ष 3 जुलाई से शुरू हुई यात्रा में श्रद्धालुओं को बाबा बर्फानी के दिव्य दर्शन का सौभाग्य तो मिला, लेकिन इसके पीछे की प्रशासनिक अव्यवस्था ने गहरी चिंताएं पैदा कर दी हैं। जो भी श्रद्धालु वहां पहुंचा, उसे जम्मू प्रशासन के स्तर पर भारी कुप्रबंध देखने को मिला। जमीन पर ऐसी स्थितियां बनीं, जहां पैसे लेकर अवैध रजिस्ट्रेशन कराने वाले एजेंटों का बोलबाला रहा। देखा गया कि हजार-हजार रुपये की सेटिंग के दम पर चहेतों और वीआईपी लोगों को पहले दर्शन कराए जा रहे थे, जबकि दूर-दूर से आए आम श्रद्धालु घंटों लाइनों में खड़े रहने को मजबूर थे।

​इस वीआईपी कल्चर और कथित भ्रष्टाचार के कारण गुफा परिसर में क्षमता से अधिक भीड़ को अनियंत्रित तरीके से भेजा गया। जिनको दर्शन भी दस फीट की दूरी से और आम श्रद्धालुओं को तीस फीट की दूरी से दर्शन करवाए गए। इस अतिरिक्त और बेतरतीब भीड़ के कारण गुफा के भीतर का तापमान और उमस अप्रत्याशित रूप से बढ़ गई, जिसका सीधा असर प्राकृतिक हिमशिवलिंग पर पड़ा और वे मात्र पांच दिन में ही—समय से बहुत पहले—अंतर्ध्यान हो गए। जबकि यात्रा समाप्ति की तिथि 28 अगस्त है। अब वहां जाने वाले जत्थे केवल गुफा के दर्शन कर रहे है। दूसरी ओर, श्रीनगर और अन्य केंद्रों पर श्री अमरनाथ श्राइन बोर्ड व प्रशासन के ढुलमुल रवैये के कारण प्रतिदिन पांच सौ से हजार लोग परेशान होकर बिना दर्शन किए ही अपने घरों को लौटने को मजबूर होते रहे।

​इस पूरे कुप्रबंध के पीछे एक बड़ा राजनीतिक और रणनीतिक पहलू भी नजर आता है। ऐसा प्रतीत होता है कि स्थानीय प्रशासन के कुछ तत्वों द्वारा जानबूझकर हिंदू श्रद्धालुओं को प्रताड़ित करने का प्रयास किया जा रहा हो। जब श्रद्धालु बुनियादी सुविधाओं और सुरक्षा के लिए तरसते हैं, तो उनका आक्रोश स्वाभाविक रूप से केंद्र सरकार के प्रति बढ़ता है। यह सनातनी और राष्ट्रभक्त सरकार की छवि को धक्का पहुंचाने और उसे बदनाम करने का एक सोचा-समझा चक्रव्यूह ज्यादा नजर आता है। जब देश की बहुसंख्यक आबादी अपनी सबसे पवित्र यात्रा में खुद को ठगा और उपेक्षित महसूस करेगी, तो इसका सीधा दोष केंद्र की व्यवस्था पर ही मढ़ा जाएगा। इस दुर्भावनापूर्ण चक्रव्यूह को समय रहते तोड़ना अत्यंत आवश्यक है।

​यदि हमें जलवायु परिवर्तन के इस दौर में अमरनाथ यात्रा की दिव्यता और हिमशिवलिंग के अस्तित्व को दीर्घकाल तक सुरक्षित रखना है, तो पारंपरिक ढर्रे को छोड़कर वैज्ञानिक और कठोर प्रशासनिक कदम उठाना अनिवार्य है—

1. ​यात्रा की तिथि में बदलाव: चूंकि हिमशिवलिंग मई-जून में अपने पूर्ण और भव्य स्वरूप में आ जाता है, इसलिए यात्रा को हर साल जून के अंत के बजाय मई के आखिरी सप्ताह या जून के शुरुआती सप्ताह में प्रारंभ किया जाना चाहिए। इससे अधिकतम श्रद्धालु बाबा बर्फानी के पूर्ण आकार के दर्शन कर सकेंगे।

2. ​सुरक्षा बलों को कमान: बालटाल, पहलगाम और श्रीनगर जैसे मुख्य पंजीकरण और नियंत्रण केंद्रों की कमान स्थानीय नागरिक प्रशासन के बजाय पूर्ण रूप से सीमा सुरक्षा बल (बीएसएफ) या भारतीय सेना को सौंपी जानी चाहिए। सेना की अनुशासनप्रियता से भ्रष्टाचार, एजेंट राज और वीआईपी कल्चर पर पूरी तरह विराम लगेगा।

3. ​शून्य उत्सर्जन क्षेत्र: पर्यावरणीय संतुलन के लिए पवित्र गुफा के ठीक पास संचालित होने वाले लंगरों और तंबुओं को कम से कम 2 किलोमीटर दूर स्थापित किया जाना चाहिए। इस अंतिम 2-3 किलोमीटर के क्षेत्र को धुआं, गैस सिलेंडर के उपयोग तथा प्लास्टिक कचरे से पूरी तरह मुक्त घोषित करना अनिवार्य है, ताकि वहां का स्थानीय तापमान न बढ़े।



​अमरनाथ यात्रा केवल पर्यटन नहीं, सनातनी आस्था की परीक्षा और हमारा गौरव है। जगत नियंता बाबा बर्फानी सब देखते हैं; जब मानवीय लालच और व्यवस्था का खिलवाड़ बढ़ता है, तो वे जल्दी अंतर्ध्यान होकर हमें चेतावनी देते हैं। केंद्र सरकार को इस विषय पर त्वरित संज्ञान लेते हुए स्थानीय प्रशासन की मनमानी पर लगाम लगानी चाहिए, ताकि भविष्य में किसी भी श्रद्धालु की आस्था आहत न हो और सनातनियों की प्रिय सरकार की छवि निष्कलंक बनी रहे।


लेखक — पत्रकार 

स्वरचित, मौलिक व प्रकाशित आलेख 

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