राजीव त्यागी
हाल में ही राजा रघुवंशी और केतन अग्रवाल जैसे मामलों ने पूरे देश को विचलित कर दिया। इनमें सबसे अधिक परेशान करने वाला पक्ष यह है कि हत्याएं उन लोगों ने कीं, जिन पर सबसे अधिक विश्वास किया गया था। विश्वास का यह टूटना ही समाज को भयभीत करता है। किसी भी सभ्यता की शक्ति उसकी सैन्य या आर्थिक ताकत नहीं, बल्कि उसके रिश्तों में निहित भरोसा होता है।
जब यह भरोसा टूटने लगता है, तब समाज भीतर से कमजोर होने लगता है। यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि कोई युवती या युवक किसी रिश्ते से संतुष्ट नहीं है, तो क्या उसके सामने ‘ना’ कहने का विकल्प नहीं था? आधुनिक समाज ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता को पर्याप्त स्थान दिया है। सगाई तोड़ना, विवाह से इनकार करना, आपसी सहमति से अलग होना-ये सभी वैधानिक और सामाजिक विकल्प उपलब्ध हैं।
फिर हत्या जैसी भयावह मानसिकता क्यों जन्म ले रही है? इस प्रश्न का उत्तर केवल कानून या पुलिस के पास नहीं है। इसके लिए समाजशास्त्रियों, मनोवैज्ञानिकों, शिक्षाविदों, धर्माचार्यों और परिवार संस्थाओं को मिलकर मंथन करना होगा। आज का युवा एक ऐसे संक्रमणकाल से गुजर रहा है, जहां पारंपरिक मूल्य और आधुनिक जीवनशैली के बीच गहरा द्वंद्व मौजूद है। एक ओर परिवार की अपेक्षाएं हैं, दूसरी ओर व्यक्तिगत इच्छाएं। संवाद के अभाव में यह द्वंद्व कई बार मानसिक तनाव, विद्रोह और हिंसा का रूप ले लेता है।
पिछले कुछ वर्षों में देश ने श्रद्धा वालकर हत्याकांड, निक्की यादव हत्याकांड, बेंगलुरु, दिल्ली और अन्य महानगरों में प्रेम-संबंधों से जुड़े अनेक जघन्य अपराध देखे हैं। इन घटनाओं ने स्पष्ट किया है कि प्रेम, विवाह और संबंधों को लेकर समाज में गहरी अस्थिरता एवं अविश्वास बढ़ रहा है।
यह अस्थिरता केवल स्त्री या पुरुष तक सीमित नहीं है, दोनों पक्षों में हिंसक प्रवृत्तियां दिखाई दे रही हैं। मोबाइल संस्कृति और डिजिटल संसार ने इस संकट को और जटिल बनाया है। डिजिटल दुनिया में बने रिश्ते कई बार वास्तविक जीवन की जिम्मेदारियों और मर्यादाओं से कटे होते हैं। परिणामस्वरूप धैर्य, सहनशीलता और त्याग जैसी पारिवारिक जीवन की आवश्यक विशेषताएं कमजोर पड़ रही हैं। लेकिन अब इस विषय पर संतुलित दृष्टिकोण अपनाए जाने की आवश्यकता है।





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