टी -20 में भारतीय क्रिकेट का कठिन दौर

- नृपेन्द्र अभिषेक 'नृप'
इंग्लैंड के खिलाफ टी-20 श्रृंखला में टीम इंडिया की एकतरफा हार ने भारतीय क्रिकेट जगत को झकझोर दिया है। इससे पहले आयरलैंड के खिलाफ मिली अप्रत्याशित पराजय ने भी यह संकेत दे दिया था कि दुनिया की नंबर एक टी-20 टीम कही जाने वाली भारत की चमक अब फीकी पड़ती दिखाई दे रही है। क्रिकेट में हार-जीत सामान्य बात है, लेकिन लगातार दो विदेशी दौरों पर जिस तरह टीम का प्रदर्शन रहा, उसने केवल खिलाड़ियों की तकनीकी कमियों को ही नहीं, बल्कि चयन नीति, टीम प्रबंधन और तैयारी की कमजोरियों को भी उजागर कर दिया। यही कारण है कि आज हर क्रिकेट प्रेमी यह सवाल पूछ रहा है कि आखिर भारतीय टीम की इस गिरावट का वास्तविक कारण क्या है और इससे बाहर निकलने का रास्ता क्या हो सकता है।

किसी भी खेल में हार केवल खिलाड़ियों की नहीं होती, बल्कि पूरी व्यवस्था की होती है। इसलिए केवल कप्तान श्रेयस अय्यर या मुख्य कोच गौतम गंभीर को निशाने पर लेना उचित नहीं होगा। श्रेयस अय्यर लंबे अंतराल के बाद टी-20 अंतरराष्ट्रीय क्रिकेट में लौटे थे और उन्हें सीधे कप्तानी की जिम्मेदारी भी सौंप दी गई। ऐसे में उनसे तुरंत चमत्कार की अपेक्षा करना व्यावहारिक नहीं था। इंग्लैंड के खिलाफ उनके व्यक्तिगत प्रदर्शन में भी कुछ अच्छी पारियां देखने को मिलीं, लेकिन टीम के सामूहिक प्रदर्शन की कमजोरी उन प्रयासों पर भारी पड़ गई। कप्तान तभी सफल हो सकता है जब उसके पास स्थिर टीम, स्पष्ट रणनीति और प्रबंधन का पूरा विश्वास हो।

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड को भी इस हार का गंभीर आत्ममंथन करना चाहिए। आईपीएल समाप्त होने के तुरंत बाद खिलाड़ियों को विदेशी दौरे पर भेज दिया गया, जबकि इंग्लैंड और आयरलैंड जैसी परिस्थितियों में खेलने के लिए अलग तरह की तैयारी की आवश्यकता होती है। भारतीय सपाट पिचों और इंग्लैंड की स्विंग तथा उछाल वाली पिचों में जमीन-आसमान का अंतर है। खिलाड़ियों को वहां की परिस्थितियों के अनुरूप अभ्यास का पर्याप्त समय नहीं मिला। इसके साथ ही कई अनुभवी खिलाड़ियों को आराम देने का निर्णय भी टीम के संतुलन पर भारी पड़ा। सूर्यकुमार यादव, जसप्रीत बुमराह और हार्दिक पांड्या जैसे अनुभवी खिलाड़ियों की गैरमौजूदगी पूरे दौरे में महसूस की गई। ऐसा प्रतीत हुआ कि विपक्षी टीमों को अपेक्षाकृत हल्के में लिया गया, जिसका परिणाम मैदान पर स्पष्ट दिखाई दिया।

टीम इंडिया की सबसे बड़ी समस्या इस समय केवल तकनीकी नहीं, बल्कि मानसिक भी दिखाई देती है। वर्तमान टीम प्रबंधन लगातार खिलाड़ियों को अंदर-बाहर कर रहा है। एक-दो खराब पारियों के बाद खिलाड़ियों को बाहर का रास्ता दिखा दिया जाता है, जबकि कई बार अच्छा प्रदर्शन करने वाले खिलाड़ी भी अगले मैच में टीम से बाहर कर दिए जाते हैं। ऐसी स्थिति में किसी भी खिलाड़ी के मन में यह डर स्वाभाविक रूप से बैठ जाता है कि यदि आज प्रदर्शन नहीं हुआ तो अगला अवसर शायद न मिले। यह भय खिलाड़ियों को स्वाभाविक खेल खेलने से रोकता है। क्रिकेट आत्मविश्वास का खेल है और जब खिलाड़ी हर गेंद पर अपने स्थान की चिंता करने लगे तो उसका प्रदर्शन प्रभावित होना तय है।

संजू सैमसन का उदाहरण सबसे उपयुक्त माना जा सकता है। उन्होंने विश्व कप और आईपीएल दोनों में प्रभावशाली प्रदर्शन किया, फिर भी उन्हें लगातार अवसर नहीं मिले और कई बार बिना किसी स्पष्ट कारण के टीम से बाहर कर दिया गया। यदि कोई खिलाड़ी लगातार अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद अपनी जगह सुरक्षित महसूस नहीं करता तो यह संदेश पूरी टीम में जाता है कि मेहनत और प्रदर्शन से अधिक चयन की अनिश्चितता हावी है। इससे युवा खिलाड़ियों का आत्मविश्वास भी प्रभावित होता है। टीम प्रबंधन को यह समझना होगा कि स्थिरता किसी भी सफल टीम की सबसे बड़ी ताकत होती है। ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और अन्य सफल टीमें खिलाड़ियों को लंबा अवसर देती हैं, जिससे वे खुलकर खेल पाते हैं।

भविष्य को ध्यान में रखते हुए टीम संयोजन पर भी नए सिरे से विचार करने की आवश्यकता है। युवा बल्लेबाज वैभव सूर्यवंशी ने अपनी प्रतिभा से सभी को प्रभावित किया है। उनकी बल्लेबाजी की सबसे बड़ी विशेषता उनका स्वाभाविक आक्रामक खेल है। टीम प्रबंधन को चाहिए कि उन्हें अभिषेक शर्मा के साथ पारी की शुरुआत करने का अवसर दिया जाए। दोनों युवा बल्लेबाज शुरुआती ओवरों में विपक्षी गेंदबाजों पर दबाव बनाने की क्षमता रखते हैं। लेकिन वैभव पर लंबे समय तक टिके रहने का अनावश्यक दबाव नहीं डाला जाना चाहिए। उन्हें वही खेलने दिया जाए, जो उनका स्वाभाविक खेल है। जब युवा खिलाड़ी अपने नैसर्गिक अंदाज में खेलते हैं, तभी उनका आत्मविश्वास और प्रभाव दोनों बढ़ते हैं।

यहीं पर नंबर तीन की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है। यह जिम्मेदारी संजू सैमसन को सौंपी जा सकती है। संजू तकनीकी रूप से मजबूत बल्लेबाज हैं और परिस्थिति के अनुसार अपनी पारी को ढालने की क्षमता रखते हैं। यदि शुरुआती विकेट जल्दी गिर जाएं तो वह पारी संभाल सकते हैं और यदि ओपनर तेज शुरुआत देकर जाएं तो उसी गति को आगे भी बढ़ा सकते हैं। उनके अनुभव और परिपक्वता का सबसे बेहतर उपयोग नंबर तीन पर ही हो सकता है। इसी प्रकार ईशान किशन केवल ओपनिंग बल्लेबाज नहीं हैं। घरेलू क्रिकेट और आईपीएल में उन्होंने मध्यक्रम में भी कई उपयोगी पारियां खेली हैं। इसलिए उन्हें मिडिल ऑर्डर की जिम्मेदारी देकर टीम को अतिरिक्त संतुलन दिया जा सकता है। इससे बल्लेबाजी क्रम भी अधिक लचीला और मजबूत बनेगा।

भारतीय क्रिकेट की सफलता हमेशा संतुलित टीम पर आधारित रही है। केवल विस्फोटक बल्लेबाजी किसी टीम को लगातार विजेता नहीं बना सकती। टी-20 क्रिकेट में भी वही टीम सफल होती है जिसकी बल्लेबाजी गहरी हो, गेंदबाजी विविधतापूर्ण हो और क्षेत्ररक्षण उत्कृष्ट हो। इंग्लैंड के खिलाफ भारतीय टीम तीनों विभागों में पिछड़ती दिखाई दी। बल्लेबाज परिस्थितियों के अनुरूप खुद को ढाल नहीं सके, गेंदबाज निरंतर सही लाइन-लेंथ नहीं रख पाए और क्षेत्ररक्षण में भी कई महत्वपूर्ण अवसर गंवाए गए। इन सभी पहलुओं पर समान रूप से ध्यान देना होगा।

पूर्व कप्तान मोहम्मद अजहरुद्दीन की यह बात बिल्कुल सही है कि इंग्लैंड में आईपीएल जैसी बल्लेबाजी नहीं की जा सकती। वहां गेंद अधिक स्विंग करती है, विकेट में अतिरिक्त उछाल होती है और मौसम भी लगातार बदलता रहता है। ऐसे में तकनीक, धैर्य और परिस्थितियों के अनुसार खेलना अनिवार्य हो जाता है। भारतीय खिलाड़ियों को विदेशी दौरों से पहले विशेष प्रशिक्षण शिविर, अभ्यास मैच और स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप तैयारी का पर्याप्त अवसर मिलना चाहिए। केवल प्रतिभा के भरोसे विदेशी दौरों पर सफलता हासिल नहीं की जा सकती।

हर असफलता अपने साथ एक सीख लेकर आती है। आयरलैंड और इंग्लैंड का यह दौरा भी भारतीय क्रिकेट के लिए एक महत्वपूर्ण सबक है। अब आवश्यकता दोषारोपण की नहीं, बल्कि दूरदर्शी सोच की है। चयन में पारदर्शिता, खिलाड़ियों को पर्याप्त अवसर, स्पष्ट भूमिकाएं, विदेशी परिस्थितियों के अनुरूप तैयारी और अनुभवी तथा युवा खिलाड़ियों का संतुलित मिश्रण ही टीम इंडिया को फिर से विश्व क्रिकेट की शिखर टीम बना सकता है। विश्व क्रिकेट में वास्तविक महानता का पैमाना विदेशी परिस्थितियों में जीत है और टीम इंडिया को अब उसी लक्ष्य की ओर पूरे आत्मविश्वास, बेहतर योजना और स्थिर नेतृत्व के साथ आगे बढ़ना होगा।
(स्वतंत्र टिप्पणीकार)

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