महंगाई से झुलसते लोग
इमला अज़ीम
आज देश के सामने सबसे बड़ा सवाल ये है कि आखिर ये महंगाई रुक क्यों नहीं रही है। आखिर क्यों सरकार की हर कोशिश नाकाम साबित हो रही है। आखिर क्यों आम आदमी झुलसने को मजबूर है। पेट्रोल व डीजल तथा सीएनजी के दामों में वृद्धि ने आम आदमी को व्यथित कर दिया है। दरअसल, पेट्रोल-डीजल के दामों में वृद्धि से न केवल यातायात महंगा हो जाता है बल्कि मालभाड़ा बढ़ने से हर चीज के दामों में उछाल आ जाता है।
पेट्रोलियम पदार्थों के दामों में वृद्धि से किसी भी वस्तु की उत्पादन लागत में दस से बीस फीसदी की वृद्धि हुई है। फलतः कंपनियों ने छूट व प्रचार खर्च में कटौती करके भंडारण क्षमता व आपूर्ति शृंखला को मजबूत करना प्राथमिक लक्ष्य बनाया है। यह भी एक हकीकत है कि रुपये के गिरते मूल्य ने भी कीमतें बढ़ाने का दबाव बनाया है। कंपनियां अपना मुनाफा बनाये रखने के लिये कीमतें बढ़ाने और पैकेटबंद उत्पादों की मात्रा घटाने की रणनीति पर काम कर रही हैं।
निश्चित रूप से पश्चिम एशिया संकट के चलते उपजे हालात ने बताया है कि भारत को ऊर्जा सुरक्षा नीति पर गंभीरता से विचार करना चाहिए। प्रधानमंत्री द्वारा ईंधन की खपत को कम करने के आह्वान के कुछ दिन बाद ही पेट्रोल, डीजल व सीएनजी के दामों में बढ़ोतरी की गई है। यह बढ़ोतरी चार साल से अधिक समय में पहली बार की गई है। जाहिर बात है कि करोड़ों मध्यम वर्गीय परिवार, किसान व छोटे व्यवसाय चलाने वाले लोगों के लिए बढ़ी ईंधन दरें जल्दी ही भोजन, परिवहन और आवश्यक वस्तुओं को महंगा बना देती हैं।
फिक्र की बात यह है कि भारत की आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता अर्थव्यवस्था को भू राजनीतिक झटकों के प्रति संवेदनशील बना देती है। रूस से मिलने वाला सस्ता कच्चा तेल हमें अस्थायी राहत ही प्रदान करता है। लेकिन यह मार्ग भी प्रतिबंधों, शिपिंग रुकावटों और कूटनीतिक दबावों के प्रति संवेदनशील बना हुआ है। वैसे तो अब ये जिंदगी की आदत सी बन गई है, लेकिन, दिल में हर बार टीस तो उठती ही है जब जिंदगी की कुछ जरूरतों में नई कटौती हो जाती है। आम लोगों का दर्द सरकार और तेल कंपनियों के लिए कचरे से ज्यादा और कुछ नहीं। देश के विकास के नाम पर आम जनता की जेब काटने का सिलसिला जारी है।





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