हज़रत इमाम हुसैन से प्रेम किसी एक संप्रदाय की विरासत नहीं है: मौलाना खुर्शीद
हुसैन किसी व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि एक संपूर्ण चरित्र का नाम है : मौलाना सैयद अब्बास बाक़री
अनीस और दबीर ने अपने मर्सियों में इस विषय को गहराई के साथ प्रस्तुत किया है : मुफ्ती मोहम्मद रिज़वान
इमाम हुसैन ने समस्त मानवता के लिए अपने प्राणों का बलिदान दिया : मौलाना सैयद अम्मार हैदर
“कर्बला की साहित्यिक और समकालीन प्रासंगिकता” विषय पर सीसीएसयू के उर्दू विभाग में कार्यक्रम आयोजित
मेरठ। हज़रत इमाम हुसैन से प्रेम किसी एक संप्रदाय की विरासत नहीं, बल्कि पूरी उम्मत की साझा धरोहर है। हमारे नबी ने फरमाया है कि मेरे घरवालों से प्रेम करना आवश्यक है, क्योंकि अल्लाह मुझसे प्रेम करता है और अल्लाह से प्रेम का तकाज़ा है कि तुम मुझसे भी प्रेम करो। कर्बला हमारे स्मरण और चर्चाओं में होनी चाहिए तथा उसका संदेश हमारे जीवन में उतरना चाहिए। यही कर्बला की वास्तविक प्रासंगिकता है। उक्त विचार मौलाना खुर्शीद ने सीसीएसयू
के उर्दू विभाग के प्रेमचंद सेमिनार हॉल में आयोजित कार्यक्रम “कर्बला की साहित्यिक और समकालीन प्रासंगिकता” की अध्यक्षीय टिप्पणी में व्यक्त किए। उन्होंने उर्दू विभाग के सदस्यों को बधाई देते हुए कहा कि वे समय-समय पर ऐसे महत्वपूर्ण विषयों पर कार्यक्रम आयोजित करते रहते हैं।
कार्यक्रम का प्रारंभ बी.ए. ऑनर्स के छात्र मोहम्मद नदीम ने किया तथा साजिद रब्बानी ने नात प्रस्तुत की। अध्यक्षता दारुल उलूम, जामा मस्जिद, मेरठ के शेखुल हदीस मौलाना खुर्शीद ने की। मुख्य वक्ताओं के रूप में मौलाना सैयद अब्बास बाक़री (तेलंगाना), मुफ्ती मोहम्मद रिज़वान (प्राचार्य, दारुल उलूम जामा मस्जिद, मेरठ), मौलाना सैयद अम्मार हैदर (आजमगढ़) तथा मौलाना मोहम्मद जिब्रील (इमाम व ख़तीब, दरियागंज, मेरठ) उपस्थित रहे। स्वागत भाषण डॉ. इरशाद सियानवी ने, संचालन डॉ. इफ्फत ज़किया ने तथा धन्यवाद ज्ञापन आफ़ाक अहमद ख़ान ने प्रस्तुत किया।
विषय-परिचय प्रस्तुत करते हुए इस्माइल नेशनल महिला पी.जी. कॉलेज की उर्दू विभागाध्यक्ष डॉ. इफ्फत ज़किया ने कहा कि कर्बला का घटना-क्रम सत्य और असत्य के बीच एक स्पष्ट विभाजन रेखा था। इसने सदा के लिए सिद्ध कर दिया कि असत्य चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न दिखाई दे, वह सत्य को झुका नहीं सकता। सदियाँ बीत जाने के बाद भी कर्बला के पात्रों को याद किया जाता है। साहित्य में भी कर्बला की घटनाओं को अत्यंत प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया गया है।
प्रोफेसर असलम जमशेदपुरी ने कहा कि साहित्य की अनेक विधाएँ हैं। मर्सिया पहले से मौजूद था, किंतु कर्बला की घटना के बाद मर्सियों में कर्बला का उल्लेख प्रमुख रूप से होने लगा, जिन्हें कर्बलाई मर्सिये कहा जाता है। कर्बला का इतिहास केवल कविता में ही नहीं, बल्कि दास्तानों, उपन्यासों और कहानियों में भी मिलता है। गद्य साहित्य में भी कर्बला विषयक अनेक पुस्तकें उपलब्ध हैं। आज जब भी कहीं अत्याचार होता है, हमें हुसैन की याद आती है और पीड़ितों को साहस मिलता है। कर्बला की घटनाएँ सदा मानवता का मार्गदर्शन करती रहेंगी।
मौलाना मोहम्मद जिब्रील ने कहा कि यदि इमाम हुसैन कर्बला न गए होते, तो अत्याचार के विरुद्ध आवाज़ उठाने वाले लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत न बनते। आज हम देखते हैं कि यज़ीद का कोई नाम लेने वाला नहीं है, जबकि इमाम हुसैन को सभी याद करते हैं। हज़रत हुसैन से प्रेम हमारे ईमान की निशानी है। कर्बला हमें सिखाती है कि अत्याचारी चाहे कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो, उसके सामने झुकना नहीं चाहिए।
मौलाना सैयद अम्मार हैदर ने कहा कि कर्बला की एक घटना ने सदियों को प्रभावित किया है। इमाम हुसैन ने पूरी मानवता के लिए अपना बलिदान दिया। इसी कारण विभिन्न संप्रदायों और समुदायों के लोग उनका नाम सम्मान के साथ लेते हैं। कर्बला हमें यह शिक्षा देती है कि यदि कोई व्यक्ति पीड़ित है, तो उसकी सहायता करनी चाहिए। यही उसकी समकालीन प्रासंगिकता है।
मुफ्ती मोहम्मद रिज़वान ने कहा कि जब भी अत्याचार सिर उठाएगा, कर्बला की घटना सामने आएगी। नैतिक दृष्टि से यह घटना हमें सिखाती है कि किसी भी सत्ता या शक्ति के सामने अन्यायपूर्ण ढंग से नहीं झुकना चाहिए। कर्बला महिलाओं की भूमिका को भी उजागर करती है। हज़रत ज़ैनब ने शासक के दरबार में अत्याचार के विरुद्ध आवाज़ बुलंद की। मीर अनीस और मिर्ज़ा दबीर ने अपने मर्सियों में इस विषय को अत्यंत गहराई और कलात्मकता के साथ प्रस्तुत किया है।


No comments:
Post a Comment