संसदीय मुखौटे की गिरती आत्मछवि


- प्रो. नंदलाल
तृणमूल पार्टी का पश्चिम बंगाल में हारना कोई अविश्वसनीय घटना या आश्चर्य चकित करने वाली बात नहीं है। जब व्यक्ति का गुरूर उसके सिर चढ़ कर बोलने लगता है तो परिणाम अच्छा नहीं होता।यही बात हमें पश्चिम बंगाल में देखने को मिली।चुनाव कितना निष्पक्ष रहा यह यहां विषय नहीं है।जिस तरह से वहां वोट प्रतिशत शत प्रतिशत रहा तो परिणाम भी चौंकाने वाला ही रहा।पश्चिम बंगाल शांत प्रदेश नहीं है वहां बांग्ला देश की सीमा हमारे कई राज्यों को प्रभावित किए रहता है।वहां से घुसपैठ लगातार बनी रहती है और पश्चिम बंगाल में अल्पसंख्यकों की अच्छी खासी आबादी है और वहां संतुलन बनाए रखना एक बड़ी चुनौती है।
ममता बैनर्जी वहां की राजनीति में पूरा जीवन खपा चुकी हैं पर उन्होंने बंगाल में वह नहीं किया जो उन्हें करना चाहिए था।इसीलिए उन्हें वहां हार का मुंह देखना पड़ा।यहाँ तक तो गनीमत थी कि वह चुनाव हार गईं पर सब कुछ हार जाएंगी उनके उम्मीद और अचेतन मस्तिष्क में भी नहीं रहा होगा पर लोगों के दिलों में उनके प्रति नाराजगी थी जिसको समय रहते भांप नहीं पाईं और पार्टी तिनके की तरह बिखर रही है।यह मात्र उन्हीं की पार्टी की बात नहीं है यह उन सभी पार्टियों के लिए एक सबक है जो अपने भाई भतीजों को आगे बढ़ाकर अपने अनुयायियों को दर किनार कर देते हैं।आप किसी पार्टी को देख लीजिए जिसने पार्टी अपने अनुयायियों की मेहनत से खड़ा किया और अनुयायियों को जब फायदा देने की बात आती है तो लोग सत्ता के नशे पर अपने भाई भतीजों को दांव पर लगाने का प्रयत्न करते हैं।जिस नेता ने ऐसा किया उसकी पार्टी तिनके की तरह बिखर गई या बर्बाद हो गई।

आप एनसीपी को देखिए,आप शिवसेना को देखिए,आप राजद को देखिए,आप समाजवादी पार्टी को देखिए, आप बसपा को देखिए और अभी आप अन्य छोटे छोटे दलों में भी देखेंगे ऐसा ही हश्र होते हुए।तेलगुदेशम पार्टी, डी एम के, ए डी एम के सभी पार्टियां भाई भतीजेवाद की साया में आगे चल रही हैं और जिस दिन सच्चा अनुयायी अंगड़ाई लेता है उस दिन पार्टी का यही हश्र होता है जो आज ममता दीदी झेल रही हैं।मुझे लगता है कि तृणमूल के नेताओं को ममता उतनी नहीं खल रही हैं जितना अभिषेक बनर्जी खल रहे हैं।ममता ने अपने जीवन में संघर्ष किया और पार्टी को लंबे समय तक सत्ता में बनाए रखा।लेकिन शुभेंदु अधिकारी जैसे अनुयायियों को जब लगा कि यहां संघर्ष का कोई फल मिलने वाला नहीं तो बगावत करके भाजपा में चले गए।यही बात असम में हिमंता विश्वशर्मा के साथ हुई।यही घटना शिवसेना में हुई और यही घटना शरद पवार की पार्टी में घटित हुई।जब पार्टी के अन्य नेता जो अपनी मेहनत से पार्टी को आगे ले जाते हैं और जब पार्टी सत्ता में आ जाती है तो मुख्य नेता अपने भाई भतीजों को अपना अगला नेता बनाने के लिए जमीन तैयार करने लगते हैं और यही बात पार्टी के उन नेताओं को भीतर ही भीतर खलने लगती है जो अपने मेहनत पर पार्टी को खड़ा किए रहते हैं।वास्तव में पार्टी के अंदर सच्चा लोकतंत्र वही है जिसमें सबको बराबर का अवसर मिले।बराबरी का अवसर न मिलने से ही भीतर ही भीतर असंतोष उपजता है और अंततः कोई सामने आकर पार्टी को तोड़ने का खतरा मोल लेता है।
     
शिवसेना में उद्धव ठाकरे,एन सी पी में सुप्रिया सुले,राजद में तेजस्वी,समाजवादी में अखिलेश ,तृणमूल में अभिषेक बनर्जी इत्यादि लोगों की लंबी फेहरिस्त है जिनके कारण इनकी पार्टी अंदर से कमजोर और आने जाने का सिलसिला अब भी जारी है। रही बात पार्टी में टूट फूट की तो यह सिलसिला बदस्तूर जारी है।जिस पार्टी के सिंबल पर सांसद और विधायक चुनाव जीतकर आते हैं उनकी महत्वाकांक्षा भी कम नहीं होती वे भी महत्वपूर्ण पद और जिम्मेदारी चाहते हैं।उनकी अनदेखी पार्टी को भारी पड़ती है और ऐसे नेता पार्टी को चुटकी बजाकर तोड़ देते हैं।पंद्रह वर्ष सत्ता में रहने के बाद अब विधायकों और सांसदों ने तृणमूल पार्टी को अलविदा कह दिया।सत्ता जब थी तो सत्ता के साथ, सत्ता गई तो सत्ता की तलाश,यही आज के सांसदों और विधायकों का चरित्र है।आज के नेताओं में त्याग और नेतृत्व में विश्वास का अभाव है।ठगी जाती है जनता,जो इनके लिए आपस में विवाद करती है और ये सांसद अपने को जनता का प्रतिनिधि कहते हैं।इतनी गिरावट संसदीय इतिहास में कम देखने को मिलती थी पर आज तो किसी भी सांसद और विधायक का विश्वास नहीं रहा।वह कब पार्टी तोड़ने पर आमादा हो जाय कहा नहीं जा सकता।

ममता, पवार और अन्य तथाकथित नेता भी तो कांग्रेस को छोड़कर अपनी पार्टी बना लिए थे। आज तो जो नेता सबसे अधिक भ्रष्ट है पता चलता है कि वह सत्ता के साथ हो लिया। इसलिए भारतीय लोकतंत्र और उसके सजग प्रहरी इतने ज्यादे सजग हो गए हैं कि उन्हें लोकतांत्रिक मूल्यों से अधिक अपने मूल्यों की चाहत अधिक हो गई है और नेतृत्व के सारे सिद्धांत इनकी राजनीति के काले करतूतों के सामने बौने नजर आ रहे हैं।होना यह चाहिए कि यदि किसी नेता या सांसद या विधायक को अपनी पार्टी से बाहर निकलना हो तो उन्हें इस्तीफा देकर ही बाहर या किसी दल में शामिल होने की इजाजत मिलनी चाहिए।दो तिहाई की व्यवस्था खत्म होनी चाहिए और इनकी सदस्यता जानी चाहिए क्योंकि ये नेता किसी विचारधारा पर जीतकर संसद या विधायिका में पहुंचते हैं। निसंदेह इनकी यह हरकतें सोचनीय हैं जिस पर कोई स्थायी व्यवस्था बनाने की आवश्यकता है।
(शोध विवेचक, चित्रकूट)

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