युद्ध और अलनीनो के बीच खड़ी दुनिया
– मनीषा मंजरी
सुबह की पहली किरण जब खिड़की पर दस्तक देती है, तो दुनिया के किसी कोने में कोई बच्चा अपने स्कूल के लिए तैयार हो रहा होता है, कोई किसान अपनी खेत की मेड़ों पर मौसम का अनुमान लगा रहा होता है और कोई माँ अपने परिवार के लिए दिन की शुरुआत कर रही होती है। लेकिन उसी समय पृथ्वी के किसी दूसरे हिस्से में सायरनों की आवाज़ गूँज रही होती है, बमों के धमाकों से घरों की दीवारें काँप रही होती हैं और भय से भरी आँखें यह पूछ रही होती हैं कि आखिर इंसान ने इतनी प्रगति करके भी शांति को क्यों नहीं चुना।
हम एक ऐसे समय में जी रहे हैं जहाँ, मानव सभ्यता अपनी उपलब्धियों के शिखर पर दिखाई देती है। कृत्रिम बुद्धिमत्ता, अंतरिक्ष अनुसंधान, चिकित्सा विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई है। लेकिन इसी समय दो ऐसी वास्तविकताएँ हमारे सामने खड़ी हैं जो हमारी संवेदनशीलता, दूरदृष्टि और सामूहिक उत्तरदायित्व की परीक्षा ले रही हैं। युद्ध और जलवायु संकट।
हाल के दिनों में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ता तनाव पूरी दुनिया की चिंता का कारण बना हुआ है। मध्य-पूर्व लंबे समय से संघर्षों का केंद्र रहा है, लेकिन जब दुनिया की सबसे शक्तिशाली सैन्य ताकतों में से एक और क्षेत्रीय प्रभाव रखने वाला राष्ट्र आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं, तो उसका प्रभाव केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहता। मिसाइलें केवल सैनिक ठिकानों को नहीं निशाना बनातीं; उनका प्रभाव विश्व अर्थव्यवस्था, ऊर्जा आपूर्ति, अंतरराष्ट्रीय संबंधों और करोड़ों आम लोगों के जीवन तक पहुँचता है।
युद्ध का सबसे दुखद पक्ष यह है कि इसका निर्णय अक्सर सत्ता के गलियारों में लिया जाता है, लेकिन उसकी कीमत वे लोग चुकाते हैं जिन्होंने कभी युद्ध नहीं चाहा। एक सैनिक का परिवार, विस्थापित होते बच्चे, अपनी मिट्टी छोड़ने को मजबूर बुज़ुर्ग, टूटते घर और बिखरते सपने। युद्ध का वास्तविक चेहरा यही है। इतिहास हमें विजेताओं के नाम याद रखता है, लेकिन उन अनगिनत लोगों के आँसू दर्ज नहीं करता जो हर संघर्ष के बाद अपनी दुनिया फिर से बनाने की कोशिश करते हैं। लेकिन क्या केवल युद्ध ही हमारे समय का संकट है? शायद नहीं।
इसी समय प्रकृति भी अपने बदलते स्वभाव से हमें लगातार चेतावनी दे रही है। अल नीनो, जो प्रशांत महासागर के तापमान में परिवर्तन से जुड़ी एक प्राकृतिक जलवायु घटना है, दुनिया भर के मौसम चक्रों को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। भारत जैसे कृषि-प्रधान देश के लिए इसका महत्व और भी अधिक है। कमजोर मानसून, असामान्य वर्षा, लंबे सूखे, भीषण गर्मी और फसलों पर पड़ने वाला प्रतिकूल प्रभाव केवल मौसम की घटनाएँ नहीं हैं; वे करोड़ों लोगों की आजीविका, भोजन और भविष्य से जुड़े प्रश्न हैं।
किसान जब आसमान की ओर देखता है तो वह केवल बारिश का इंतज़ार नहीं करता; वह अपने बच्चों की पढ़ाई, घर के खर्च और पूरे वर्ष की उम्मीदों को बादलों से जोड़ देता है। यदि वर्षा समय पर न हो, यदि धरती की नमी छिन जाए या यदि बाढ़ उसकी मेहनत को बहा ले जाए, तो उसका संकट किसी आँकड़े से कहीं अधिक गहरा होता है।
सबसे चिंताजनक स्थिति तब उत्पन्न होती है जब युद्ध और जलवायु संकट एक-दूसरे के समानांतर चलने लगते हैं। यदि युद्धों के कारण तेल और आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति प्रभावित हो और दूसरी ओर अल नीनो के कारण खाद्यान्न उत्पादन में कमी आए, तो महँगाई, खाद्य असुरक्षा और आर्थिक अस्थिरता का खतरा बढ़ जाता है। इसका सबसे अधिक असर उन लोगों पर पड़ता है जो पहले से ही सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर हैं।
इतिहास के पन्ने पलटकर देखें तो स्पष्ट होता है कि सभ्यताओं का पतन केवल तलवारों से नहीं हुआ। सूखा, अकाल, संसाधनों की कमी और पर्यावरणीय परिवर्तन भी मानव समाजों को गहराई से प्रभावित करते रहे हैं। आज का समय हमें यह याद दिलाता है कि मानवता की चुनौतियाँ बहुआयामी हैं। राजनीतिक सीमाएँ हमें बाँट सकती हैं, लेकिन जलवायु संकट किसी पासपोर्ट या वीज़ा को नहीं पहचानता।
विडंबना यह है कि हमने विज्ञान में जितनी प्रगति की है, उतनी प्रगति शायद करुणा में नहीं कर पाए हैं। हम ग्रहों की दूरी माप सकते हैं, लेकिन अपने ही समाज में बढ़ती असमानताओं और पीड़ाओं की गहराई को समझने में अक्सर असफल हो जाते हैं। हम भविष्य की तकनीकें गढ़ रहे हैं, लेकिन वर्तमान की संवेदनहीनता से जूझ रहे हैं।
ऐसे समय में साहित्य, कला और विचार की भूमिका और अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है। वे हमें आँकड़ों के पीछे छिपे मनुष्यों को देखने की दृष्टि देते हैं। वे याद दिलाते हैं कि समाचारों में दिखाई देने वाले चेहरों के भी सपने होते हैं, रिश्ते होते हैं और भय होते हैं। वे हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करते हैं कि विकास का वास्तविक अर्थ क्या है? क्या वह केवल आर्थिक वृद्धि है, या उसमें मानवीय गरिमा और पर्यावरणीय संतुलन भी शामिल हैं?
फिर भी निराशा अंतिम सत्य नहीं है।
मानव इतिहास संघर्षों से भरा रहा है, लेकिन उसी इतिहास में पुनर्निर्माण, सहयोग और आशा की अनगिनत कहानियाँ भी दर्ज हैं। युद्धों के बाद शहर फिर बसे हैं। अकालों के बाद खेतों ने फिर हरियाली ओढ़ी है। आपदाओं के बाद लोगों ने एक-दूसरे का हाथ थामकर जीवन को फिर से शुरू किया है। यही मनुष्य होने का सबसे सुंदर पक्ष है, टूटने के बाद भी निर्माण करने की क्षमता।
आज आवश्यकता केवल कूटनीतिक समझौतों और आर्थिक नीतियों की नहीं है। आवश्यकता इस बात की है कि हम यह स्वीकार करें कि पृथ्वी हमारी साझा विरासत है और मानवता हमारी साझा पहचान। यदि किसी देश का बच्चा युद्ध से भयभीत है या किसी किसान की फसल जलवायु संकट से नष्ट हो रही है, तो वह केवल उसकी व्यक्तिगत त्रासदी नहीं, बल्कि पूरी सभ्यता की असफलता है।
युद्ध हमें यह सिखाते हैं कि घृणा कितनी विनाशकारी हो सकती है, और अल नीनो हमें याद दिलाता है कि प्रकृति के साथ असंतुलन की कीमत कितनी भारी पड़ सकती है। शायद यही हमारे समय का सबसे बड़ा प्रश्न है—क्या हम अपनी बुद्धिमत्ता को करुणा के साथ जोड़ पाएँगे? क्या हम प्रगति को उत्तरदायित्व के साथ परिभाषित कर पाएँगे? क्योंकि अंततः आने वाली पीढ़ियाँ हमें हमारी सैन्य शक्ति या तकनीकी उपलब्धियों से नहीं, बल्कि इस बात से याद रखेंगी कि जब पृथ्वी और मानवता दोनों संकट में थीं, तब हमने कौन-सा रास्ता चुना था? विनाश का या सह अस्तित्व का।
(उपन्यासकार और कवयित्री, दरभंगा)





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