महंगी होती शिक्षा
इलमा अज़ीम
पिछले कुछ दशकों में भारत में शिक्षा का तेजी से विस्तार हुआ है। निजी स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और कोचिंग संस्थानों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। लेकिन इसके साथ ही शिक्षा की लागत भी लगातार बढ़ती गई है। आज एक मध्यमवर्गीय परिवार को अपने बच्चे की स्कूली शिक्षा पर ही बड़ी राशि खर्च करनी पड़ती है। स्कूल फीस, परिवहन शुल्क, किताबें, यूनिफॉर्म, डिजिटल उपकरण और सह-पाठ्यक्रम गतिविधियाँ मिलकर शिक्षा को महंगा बना रही हैं। उच्च शिक्षा की स्थिति और भी चुनौतीपूर्ण है। चिकित्सा, इंजीनियरिंग, प्रबंधन और कानून जैसे पेशेवर पाठ्यक्रमों की फीस लाखों रुपये तक पहुँच चुकी है।
यही हाल स्वास्थ्य सेवाओं का भी है। गरीब वर्ग लंबे समय से शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की चुनौतियों का सामना करता रहा है, लेकिन अब मध्यम वर्ग भी बढ़ती लागतों के दबाव को महसूस कर रहा है। एक ओर माता-पिता बच्चों की शिक्षा के लिए अपनी आवश्यकताओं में कटौती कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर चिकित्सा आपात स्थितियाँ उनके वित्तीय संतुलन को बिगाड़ रही हैं। घर, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसे बुनियादी खर्चों के बीच संतुलन बनाना कठिन होता जा रहा है।
अगर हम विचार करें तो यह स्थिति केवल आर्थिक समस्या नहीं है; यह सामाजिक गतिशीलता और अवसरों की समानता पर भी प्रभाव डालती है। यदि गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा केवल संपन्न वर्ग तक सीमित हो जाए, तो सामाजिक असमानताएँ और गहरी हो सकती हैं। कई परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए ऋण लेने या अपनी बचत खर्च करने को मजबूर हैं। परिणामस्वरूप शिक्षा, जो कभी सामाजिक उन्नति का सबसे बड़ा साधन मानी जाती थी, अब अनेक परिवारों के लिए आर्थिक बोझ बनती जा रही है। उधर, स्वास्थ्य सेवाओं की लागत में लगातार वृद्धि हुई है।
डॉक्टरों की परामर्श फीस, परीक्षणों का खर्च, दवाइयों की कीमतें और अस्पतालों के बिल आम लोगों के लिए चिंता का विषय बन गए हैं। एक गंभीर बीमारी या आकस्मिक दुर्घटना किसी भी परिवार की वर्षों की बचत समाप्त कर सकती है। हालांकि स्वास्थ्य बीमा का दायरा बढ़ा है, लेकिन यह अभी भी सभी नागरिकों को पर्याप्त सुरक्षा प्रदान नहीं कर पाता। परिणामस्वरूप लाखों परिवार हर वर्ष स्वास्थ्य संबंधी खर्चों के कारण आर्थिक संकट में फँस जाते हैं।





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