दावे के बावजूद प्रतिनिधित्व कम


महिला आरक्षण की जोरदार वकालत करने वाले राजनीतिक दल हकीकत में महिलाओं को उनका हक देने में ईमानदार नहीं हैं। हाल ही में पश्चिम बंगाल, केरल, असम, तमिलनाडु और पुडुचेरी में विधानसभा चुनावों में महिलाओं को दिये गए टिकटों ने हकीकत बयां कर दी। महिला आरक्षण के नाम पर पिछले दिनों जमकर राजनीति करने वाले दलों ने तैंतीस प्रतिशत तो दूर, इसकी आधी संख्या के बराबर भी महिलाओं को टिकट नहीं दिए।                         उल्लेखनीय है कि हाल में चार राज्यों व एक केंद्रशासित प्रदेश के लिए कुल आठ सौ चौबीस सीटों पर चुनाव संपन्न हुए थे, जिनमें सिर्फ पांच फीसदी सीटों पर ही महिलाएं चुनाव जीतने में सफल हो पायी हैं। दरअसल, जिस प्रतिशत में महिलाओं को आरक्षण देने की पुरजोर वकालत करते राजनीतिक दल नजर आते हैं, उस अनुपात में किसी भी राजनीतिक दल ने उन्हें टिकट नहीं दिए। 

यहां उल्लेखनीय है कि पश्चिम बंगाल, जिस राज्य को लेकर देश में सबसे ज्यादा गहमागहमी रही, वहां सत्तारूढ़ भाजपा ने कुल 294 सीटों में से तैंतीस पर ही महिलाओं को टिकट दिए। वहीं दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस ने 291 सीटों में बावन महिलाओं को टिकट दिए। कुल मिलाकर राज्य में सिर्फ दस फीसदी महिलाएं ही विधानसभा पहुंच पायीं। निश्चय यह आंकड़ा 33 फीसदी का एक-तिहाई भी नहीं है। कमोबेश तमिलनाडु में सत्ता की दहलीज पर खड़ी टीवीके ने जिन 234 सीटों पर चुनाव लड़ा, उसमें सिर्फ 24 महिलाओं को ही टिकट दिए गए।

 इसी तरह असम में सत्ता में आए राजग ने सिर्फ छह महिलाओं को ही उम्मीदार बनाया था। वहीं प्रगतिशील होने का दावा करने वाले कांग्रेस नीत यूडीएफ ने सिर्फ दस महिलाओं को ही टिकट दिए। जाहिर है सभी दलों में महिलाओं को उनका हक देने के प्रति उदासीनता देखी गई। किसी भी राजनीतिक दल में स्वत: ही महिलाओं को ईमानदारी से तैंतीस फीसदी आरक्षण देने की इच्छाशक्ति नजर नहीं आती है। 

सवाल है कि जो राजनीतिक दल हाल में महिलाओं को आरक्षण देने और परिसीमन के मुद्दे पर संसद में जमकर राजनीति कर रहे थे, वे टिकट वितरण के समय महिलाओं के हक को लेकर गंभीर क्यों नजर नहीं आए? उन्होंने महिलाओं को पर्याप्त संख्या में टिकट देने के प्रति उत्साह क्यों नहीं दिखाया? सवाल यही है कि जब संसद में महिला आरक्षण विधेयक लागू करने में सभी राजनीतिक दलों ने अपनी प्रतिबद्धता जतायी है तो टिकट बांटते समय उनकी सोच क्यों नहीं बदलती? उनकी कथनी-करनी का यह अंतर कब तक जारी रहने वाला है? इस मुद्दे पर उनका संजीदा व्यवहार क्यों नहीं होता है?

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