सड़कों पर अनुशासन जरूरी

राजीव त्यागी 
मंगलवार को सूरत में दो बसों की आमने-सामने हुई टक्कर में ई लोगों की जानें चली गईं। सरकार ने प्रभावितों को मुआवजा देने की घोषणा कर दी है, लेकिन इस हादसे में जिन लोगों के घरों के लोग मारे गए गए हैं उनकी भरपाई कैसे होगी। सवाल उठता है है कि आए दिन राजमार्गों पपर होने वाली दुर्घटनाओं के बाद भी कोई ठोस पहल क्यों नहीं की जा रही है। देश के नीति-नियंताओं की सोच रही है कि विकास के लिए चौड़ी व रफ्तार वाली सड़कें जीवन रेखा का काम करें। देश के उत्थान के लिए विकास के बुनियादी ढांचे को प्राथमिकता दी।


 लेकिन विकास की इस उन्नति के साथ ही राष्ट्रीय राजमार्गों से जुड़ी विसंगति भी सामने आई कि इन पर होने वाली दुर्घटनाओं में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। हादसों का यह सिलसिला लगातार जारी है। सवाल उठता है कि उच्च तकनीक से तैयार आकर्षक व सुविधाजनक एक्सप्रेस-वे और राष्ट्रीय राजमार्ग यात्रियों की सुरक्षा की कसौटी पर खरे क्यों नहीं उतर पा रहे हैं। यूं तो देश की कुल सड़कों में दो फीसदी ही राष्ट्रीय राजमार्ग हैं, लेकिन देश में होने वाली सड़क दुर्घटनाओं में इनकी संख्या तीस फीसदी हो गई है। जो हमारी गंभीर चिंता का सबब बन रहा है। चिंता यह भी है कि अधिकारियों की उदासीनता व निर्माण से जुड़ी खामियों की वजह से राजमार्ग व एक्सप्रेस-वे दुर्घटना के कारक नहीं बनने चाहिए। 

इस दिशा में अविलंब कार्रवाई होनी चाहिए ताकि मार्ग खतरे का गलियारा न बने। देश में आम लोगों में ट्रैफिक से जुड़ी अनुशासन की सोच पूरी तरह से विकसित नहीं हो पायी है। खुली सड़क मिलते ही रफ्तार तेज होने लगती है, यह जानते हुए कि ये गति हमारी दुर्गति का कारण भी बन सकती है। इसके अलावा तेज स्पीड में भी फोन पर बात करते रहना और शराब पीकर वाहन चलाना भी सड़क दुर्घटनाओं को बढ़ाने वाला साबित हुआ है। यह आंकड़ा डराता है कि साल भर में होने वाली करीब साढ़े चार लाख से अधिक सड़क दुर्घटनाओं में हर साल डेढ़ लाख से अधिक लोगों की मौत हो जाती है। इसके अलावा लाखों लोग घायल होते हैं। दुर्भाग्य से लाखों लोग ऐसे भी होते हैं जो जीवनपर्यंत अपंगता का शिकार हो जाते हैं। विडंबना यह भी कि सड़क दुर्घटनाओं में दम तोड़ने वाले लोगों में बड़ी संख्या युवा आबादी की है। ये युवा आबादी अपने परिवार की कमाई का मुख्य जरिया होती है, उनकी मौत पूरे परिवार को गरीबी की दलदल में धकेल देती है। 

यहां प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि तमाम सरकारी प्रयासों के बावजूद सड़क दुर्घटनाओं में कमी क्यों नहीं आ रही है। वास्तव में कोशिश होनी चाहिए कि सड़क दुर्घटनाओं को रोकने के लिए होने वाले प्रयास जमीनी हकीकत भी बनें, जो वास्तव में राजमार्गों व एक्सप्रेस-वे को दुर्घटनाओं से निरापद बना सकें। निस्संदेह, चौड़ी व तेज गति देने वाली सड़कें देश के विकास को प्राणवायु देती हैं, लेकिन ये सड़कें यात्रियों की प्राण रक्षा करने वाली भी होनी चाहिए। सरकार की तरफ से कोशिश होनी चाहिए कि राजमार्गों पर ढाबे एक निश्चित दूरी पर हों और उनके पास ट्रकों व भारी वाहनों को खड़ा करने का पर्याप्त स्थान हो।

 साथ ही अक्सर बड़ी दुर्घटना का कारण बनने वाले सड़क पर खड़े वाहनों पर रोक लगाने के लिए सख्त नियम बने और सख्त जुर्माना तय हो। कायदे से राजमार्गों पर कहीं भी वाहन को खड़ा करने की अनुमति प्रदान नहीं की जानी चाहिए। साथ ही सड़क निर्माण में किसी तकनीकी खामी की गुंजाइश न रहे, इसके लिये भी पर्याप्त सतर्कता उपाय किए जाने चाहिए। 

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