महिलाओं में दिल की बीमारी के संकेत होते हैं अलग, क्या जानना है जरूरी

मेरठ। महिलाओं में दिल की बीमारी अक्सर चुपचाप विकसित होती है और इसके लक्षण भी पुरुषों से अलग हो सकते हैं। जहां पुरुषों में हार्ट अटैक के दौरान सीने में भारी दबाव या दर्द एक आम संकेत माना जाता है, वहीं महिलाओं में लक्षण अपेक्षाकृत हल्के और अलग तरह के होते हैं, जिन्हें अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता है। इन अंतर के पीछे शरीर की बनावट, हार्मोनल बदलाव और जीवनशैली जैसे कई कारण होते हैं, इसलिए समय रहते इन संकेतों को समझना बेहद जरूरी है।

दुनियाभर में महिलाओं में दिल की बीमारी मौत के प्रमुख कारणों में से एक है, फिर भी इसे अक्सर पुरुषों की बीमारी समझा जाता है। महिलाओं की कोरोनरी आर्टरीज अपेक्षाकृत छोटी होती हैं और इनमें प्लाक जमने की प्रक्रिया हार्मोनल बदलावों से प्रभावित हो सकती है। मेनोपॉज से पहले एस्ट्रोजन कुछ हद तक सुरक्षा देता है, लेकिन इसके बाद जोखिम बढ़ सकता है। इसके अलावा डायबिटीज, हाई ब्लड प्रेशर और ऑटोइम्यून बीमारियां—जो महिलाओं में अधिक देखी जाती हैं—दिल की सेहत पर अतिरिक्त प्रभाव डाल सकती हैं।

बीएलके-मैक्स सुपर स्पेशलिटी हॉस्पिटल के इंटरवेंशनल कार्डियोलॉजी विभाग के चेयरमैन डॉ. सुभाष चंद्रा ने बताया “महिलाओं में हार्ट से जुड़े लक्षण अक्सर पारंपरिक संकेतों से अलग होते हैं। सीने में तेज दर्द हर बार नहीं होता; इसकी जगह सांस फूलना, खासकर सीढ़ियां चढ़ते समय, असामान्य थकान या कमजोरी, मतली या अपच जैसा महसूस होना, पीठ, गर्दन, जबड़े या पेट के ऊपरी हिस्से में दर्द जैसे लक्षण सामने आ सकते हैं। कुछ महिलाओं को फ्लू जैसे लक्षण, बेचैनी या नींद में गड़बड़ी भी महसूस हो सकती है। क्योंकि ये संकेत सामान्य समस्याओं जैसे तनाव या बढ़ती उम्र से जुड़े लग सकते हैं, इसलिए अक्सर इन्हें गंभीरता से नहीं लिया जाता। लगातार या असामान्य लक्षणों पर तुरंत डॉक्टर से सलाह लेना जरूरी है।“

महिलाओं में जोखिम कारक भी अलग तरीके से असर डालते हैं। धूम्रपान से दिल की बीमारी का खतरा काफी बढ़ जाता है, जबकि गर्भावस्था से जुड़ी स्थितियां जैसे जेस्टेशनल डायबिटीज या प्रीक्लेम्पसिया भविष्य में हृदय रोग का संकेत हो सकती हैं। पीसीओएस और रूमेटॉयड आर्थराइटिस जैसी स्थितियां भी दिल की सेहत को प्रभावित कर सकती हैं। इसके अलावा लंबे समय तक रहने वाला तनाव और डिप्रेशन भी ब्लड वेसल्स पर नकारात्मक असर डालते हैं।

डॉ. सुभाष ने आगे बताया “दिल की बीमारी से बचाव के लिए रोजमर्रा की आदतों में सुधार बेहद प्रभावी साबित हो सकता है। संतुलित आहार जिसमें फल, सब्जियां, साबुत अनाज और लीन प्रोटीन शामिल हों, और साथ ही प्रोसेस्ड फूड, नमक व ज्यादा शुगर से परहेज किया जाए, दिल को स्वस्थ रखने में मदद करता है। नियमित फिजिकल एक्टिविटी—जैसे तेज चलना या योग—हर हफ्ते लगभग 150 मिनट करना फायदेमंद होता है। इसके साथ ही ब्लड प्रेशर, कोलेस्ट्रॉल और ब्लड शुगर की नियमित जांच जरूरी है। धूम्रपान से दूरी, स्वस्थ वजन बनाए रखना और तनाव को नियंत्रित करना भी जोखिम को कम करते हैं। 50 साल से अधिक उम्र या परिवार में दिल की बीमारी का इतिहास होने पर डॉक्टर से प्रिवेंटिव इलाज के विकल्पों पर चर्चा करना लाभदायक हो सकता है।“

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