खुद को पहचाने महिला शक्ति

आज की नारी को खद की शक्ति को पहचानना होगा। वह पुरुष वर्ग से किसी भी मामले कमतर नहीं है। महिलाओं को अपने अधिकारों को पुरुष के हाथों में नहीं सौंपना होगा। ऐसा नहीं लगना चाहिए कि वह किसी पुरुष के इशारे पर चल रही है या पुरुष की कठपुतली बनी हुई है। 

चुनावों में जीतने के बाद भी यही सामने आता है कि अधिकतर महिलाएं पढ़ी-लिखी बुद्धिमान होने के बाद भी अपनी कार्यकारी शक्तियों को पुरुष को सौंप देती हैं। ये पुरुष उनके पिता, ससुर, भाई या बेटा के रूप में उनके द्वारा किए जाने वाले कार्यों के साथ अपना नाम जोडक़र रखते हैं। स्वातंत्र्योत्तर भारत में शिक्षा का प्रचार प्रसार होने से महिलाएं आज पढ़ लिख रही हैं तथा विभिन्न कार्य क्षेत्रों में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा रही हैं।

 राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, प्रशासक, वैज्ञानिक, डॉक्टर, इंजीनियर, प्रोफेसर एवं भारतीय सेना के तीनों अंगों के अतिरिक्त न जाने कौन-कौन से पदों को गौरवान्वित करके अपने दायित्वों का निर्वहन कर रही हैं। इतनी सब उपलब्धियां होने के उपरांत भी महिलाएं पंचायती राज संस्थाओं तथा स्थानीय निकायों में अपनी शक्तियों को क्यों दूसरों के हाथों में सौंप देती हैं? महिलाओं को अपनी शक्तियों को पहचानना होगा। 
 पति द्वारा आग में जलाए जाने का आदेश एवं पुत्र द्वारा परशु से गले को रेत देने का वह बिल्कुल भी विरोध नहीं करती। यदि एक बार वह विरोध कर देती तो नारियों के प्रति युगों-युगों से इतने अत्याचार नहीं हुए होते। उसका न कुछ कहना ही उसकी कमजोरी बनी रही।



 पुरुष समाज की प्रताडऩा को मूकदर्शक बनकर झेलने का उसका गुण, अवगुण ही कहा जा सकता है। वर्तमान समय में महिलाएं बौद्धिक स्तर पर पुरुष से आगे ही हैं। अधिकतर प्रतियोगी परीक्षाओं में आज महिलाएं ही सफल हो रही हैं। 

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