करूणा
विवाह की लगभग सभी रस्में पूरी हो चुकी थी। वर-वधू एक साथ जीवन-निर्वाह की कस्मे खा चुके थे। विदाई का समय हो रहा था। दुल्हन बनी सात भाइयों की इकलौती बहन करूणा फफक-फफक कर रो रही थी। आँसुओं की गोल-गोल बूँदें गाल पर मोती सी चमक रही थी। दीवार से टिककर साड़ी के पल्लू से मुँह ढँककर विधवा माँ सावित्री रो रही थी। बचपन की सहेली करूणा की जुदाई पर सिसकती सहेलियों को उसकी जुदाई से ज्यादा दु:ख इस बात का था कि आज करूणा बंधुहीन बहन सी सजा भुगत रही है।
          मंडप में अड़ोस-पड़ोस के लोग नजर आ रहे थे। औरतें एक-दूसरे के कानों में कह रही थीं कि सभी तो दिख रहे हैं, पर करूणा के एक भी भाई नहीं दिख रहा है।
          एक अधेड़ औरत अपनी गाल पर तर्जनी टिका कर कहने लगी- 'अई...! इस समय कोई हो या न हो, लेकिन उसके बड़े भाई महेश को जरूर होना चाहिए।'
         'शायद करूणा अपने भाइयों के लिए बोझ बनी थी। इनके भाई शादी नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे बला टाल रहे हैं।' मंडप में एक स्वर उभरा।
          'साले, सभी जोरू के गुलाम हैं।' एक युवक ताने कसते हुए मंडप से निकल गया।
        एक नि:संतान औरत भोली-भाली करूणा एवं उसके अपाहिज पति को देख कर रुँधे कंठ स्वर में बस इतना ही बोल पायी- 'वाह री किस्मत !'

          बैसठ बसंत वाली सावित्री करूणा को सीने से लगा कर मंडप से बाहर हार्न दे रहे जीप की ओर बढ़ने लगी। करूणा के सर के भार से सावित्री का सीना पत्थर बन चुका था। मंडप में कोई ऐसी पलकें नहीं थीं जो तर नहीं हों।
         करूणा के सबसे करीब रहे दुल्हे राजा भावेश को मंडप से बाहर निकलते समय अपनी नई-नवेली दुल्हन का करूणा नाम सार्थक लग रहा था।
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- टीकेश्वर सिन्हा 'गब्दीवाला'


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