बुजुर्गों के पक्ष में
राजीव  त्यागी
यह किसी भी सभ्य समाज के लिए अत्यंत शर्मनाक स्थिति है कि जन्म देने और पालन-पोषण करने वाले माता-पिता को जीवन की सांझ में उपेक्षा, अपमान और आर्थिक असुरक्षा का सामना करना पड़े, और उन्हें अपने ही बच्चों से गुजारा भत्ता पाने के लिए कानून और प्रशासन का सहारा लेना पड़े। यदि बच्चे ही माता-पिता की देखभाल न करें तो यह केवल पारिवारिक विफलता नहीं, बल्कि सामाजिक अपराध की श्रेणी में आता है। 

इन्हीं परिस्थितियों को देखते हुए तेलंगाना विधानसभा द्वारा पारित “तेलंगाना कर्मचारी जवाबदेही और माता-पिता सहायता निगरानी विधेयक 2026” एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक पहल के रूप में सामने आया है। इस विधेयक का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि यदि बच्चे अपने माता-पिता की देखभाल नहीं करते, तो उनके वेतन से एक निश्चित राशि काटकर माता-पिता को दी जाए। यह कानून सरकारी कर्मचारियों के साथ-साथ निजी क्षेत्र के कर्मचारियों, सांसदों, विधायकों और स्थानीय निकायों के जनप्रतिनिधियों पर भी लागू होगा।

 इस प्रकार यह कानून केवल एक कानूनी प्रावधान नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी को कानूनी रूप देने का प्रयास है। हालांकि भारत में पहले से “माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम 2007” मौजूद है, लेकिन तेलंगाना का यह नया विधेयक अधिक व्यापक, संवेदनात्मक और प्रभावी माना जा रहा है। इसमें प्रावधान है कि यदि बच्चे माता-पिता की देखभाल नहीं करते, तो शिकायत मिलने पर उनके वेतन से पंद्रह प्रतिशत या दस हजार रुपये (जो भी कम हो) काटकर माता-पिता के खाते में जमा किए जाएंगे।

 शिकायत का निस्तारण जिला कलेक्टर द्वारा साठ दिनों के भीतर किया जाएगा और इसके लिए वरिष्ठ नागरिक आयोग का गठन भी किया जाएगा। निहितार्थ यह कि यदि समाज में बुजुर्ग असुरक्षित, उपेक्षित और अपमानित होंगे, तो विकास अधूरा रहेगा। वास्तविक विकास वही है जिसमें समाज का हर वर्ग-बच्चे, युवा, महिलाएं और बुजुर्ग सुरक्षित और सम्मानित जीवन जी सकें।



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