मानसिक स्वास्थ्य की बढ़ती चुनौतियां

- प्रो. नंदलाल
मानसिक स्वास्थ्य को लेकर पूरी दुनिया परेशान है।ग्लोबल वार्मिंग ने समस्याओं को और बढ़ा दिया है।जीवन के प्रति घोर निराशा भी एक महत्वपूर्ण कारक बनकर उभर रहा है। पर्यावरणीय संचेतना घटती जा रही है। वातावरणीय संवेदना कम हो रही है। बिना प्रकृति को बचाए हम बच नहीं सकते चाहे लाख कोशिश कर ली जाय। कृत्रिम बुद्धि, मशीन लर्निंग जैसे संप्रत्यय के आ जाने से मानसिक विकार और बढ़ेंगे। इसके लिए हमें तैयार रहना होगा। कारण कि कृत्रिम बुद्धि हजारों हजार लोगों का काम अकेले कर रही है।

मशीन वे सारे काम कर दे रहे हैं जिसको मानव मेहनत और श्रम से करता था, जिससे उसका शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य दोनों ही ठीक रहता था। किंतु अब चाहें इंजीनियर हों, डाक्टर हों, आर्किटेक्ट हों, विद्यार्थी हों, शिक्षक हों सभी ए आई और मशीन लर्निंग का उपयोग करने लगे हैं।विद्यार्थी कक्षाओं में पढ़ने नहीं जा रहे हैं। उनकी उपस्थिति दिन प्रतिदिन कक्षाओं में कम होती जा रही है कारण कि उनके पास ए आई नाम का टीचर मौजूद है। कोई भी सामग्री ए आई पर आप आसानी से ढूंढ सकते हैं और विद्यार्थी आज वही कर रहे हैं।
पहले समय में लोगों को क, ख, ग सीखने में महीनों लग जाते थे।गिनती सौ तक की याद कराई जाती थी, पहाड़ा बच्चों को रटाया जाता था। छोटे मोटे हिसाब बच्चे उंगलियों पर कर लेते थे। पर अब सब गायब है। इससे बुद्धि को तेज करने, तार्किक क्षमता बढ़ाने में मदद मिलती थी पर अब सब नदारद है। अभिभावक इसी में प्रसन्न हैं कि उनका बच्चा तो मोबाइल को हर तरह से चला लेता है जो अभिभावक नहीं जानते उसको उनका बच्चा सेकंड में चला देता है। जब बच्चा अभ्यास नहीं करेगा तो उसकी बुद्धि कैसे बढ़ेगी।

मस्तिष्क की क्रियाशीलता उसके उपयोग पर निर्भर करती है यदि उपयोग करना छोड़ दिया जाय तो उसके सोचने, समझने, और चिंतन की प्रक्रिया धीमी पड़ जाती है। उसकी क्षमता सीमित हो जाती है। वह मूर्त और अमूर्त में भेद नहीं कर पाता, उसकी तार्किक क्षमता मंद पड़ जाती है। उसकी संज्ञानात्मक क्षमताएं सिकुड़ती जाती हैं। जैसे ही उसके ऊपर कोई समस्या आती है, वह परेशान हो उठता है, बेचैन हो जाता है, उसमें मानसिक उग्रता बढ़ने लगती है।
      मैने ऐसे ऐसे बच्चे देखे हैं, उनसे बात भी की है। स्कूलों में वे पढ़ने के लिए मोटी रकम अदा करते हैं। कॉन्वेंट के नाम पर अच्छी फीस भी वे लेते हैं पर उनसे पाठ्यक्रम से हटकर छोटे और सरल सवाल पूछे जाते हैं तो वे उसे बता नहीं पाते। अभिभावकों की असीमित इच्छाएं और आकांक्षाएं बच्चों पर अनावश्यक दबाव बनाती हैं। इससे बच्चे तनाव में आते हैं। जहां तक सामान्य लोगों की बात है उनकी जीवन शैली में बदलाव, खान पान में परिवर्तन, आहार विहार में गड़बड़ी, व्यवहार में बदलाव, आवश्यकता से अधिक इच्छाएं, पड़ोसी से प्रतिस्पर्धा और संतोष में कमी व्यक्ति को तनाव की तरफ ले जा रहे हैं।

समाज और देश स्तर पर पनप रही विकृतियां जैसे किसी को मार देना, गली गलौज करना, घूसखोरी करना, हर काम के लिए घूस मांगना, हिंसा करना, व्यभिचार, भ्रष्टाचार, बलात्कार इत्यादि घटनाएं दूसरों के लिए मॉडल बन रहा है। ऐसे जुर्म के लिए कोई सजा नहीं मिलती। छोटे लोग जब यह गलतियां करते हैं तो उन्हें तो नाना प्रकार की प्रताड़ना मिलती है पर बड़े बड़े लोग यह करने के बाद भी सजा नहीं पाते। यही नई पीढ़ी सीखती है और तदनुसार आचरण करती है।

हिंसा के विविध रूप सामने आ रहे हैं। पत्नी पति का कत्ल करवा देती है।पति दहेज और अवैध संबंधों का पृष्ठपोषण करता है। सबसे अधिक हत्याएं और आत्महत्याएं वैवाहिक संबंधों को लेकर, किसानों द्वारा लोन लेकर चुका न पाना, तथा छात्रों द्वारा अभिभावकों की प्रत्याशाओं पर खरा न उतर पाना तथा लव मैरेज को लेकर हो रही हैं। हमारे दंड का प्रावधान इतना कमजोर है कि कोई भी व्यक्ति आपराधिक घटना करके बच निकलता है।

सबसे बड़ा कारण व्यक्ति के अचेतन मन पर पड़ने वाला प्रभाव है।मानव का अचेतन मन प्रायः शांत रहता है और उसमें वे घटनाएं संचित होती हैं जो हमारे इगो को ठेस पहुंचाने वाली होती हैं।पर आधुनिक पाश्चात्य जीवन शैली  हमारे अचेतन मन को शांत और स्थिर नहीं रहने देता।जब उसका प्रवाह तेज हो जाता है तो वह अचेतन मन को मथ डालता है और जब अचेतन मन में हलचल बढ़ जाती है तो वह निकलने को बेताब हो जाती हैं और हमारे चेतन मन को  वह धक्का देता है जिससे चेतन मन असंतुलित हो जाता है।
परिणाम मानसिक तनाव और उलझन के रूप में हमे देखने को मिलता है।जब हमारी जीवन शैली अपने परिवेश, संस्कार, संस्कृति और धर्मानुकूल  होती है तो चेतना विस्तारित होती है किंतु जब हम विरुद्ध आचरण करते हैं तो अचेतन में हलचल उत्पन्न होती है परिणामस्वरूप मानसिक विकार और अशांति मानव को घेर लेते हैं। इसी कारण आज संपूर्ण विश्व मानसिक समस्याओं से जूझ रहा है। भारत वर्ष में भी अब यह पांव फैला रहा है।इसलिए जागरूकता की जरूरत है।
(शोध विवेचक, चित्रकूट)

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