देर ही सही

'सच स्नेहा ! तुम बहुत खुबसूरत हो। तुम्हारी बाॅडी में बड़ी नज़ाकत है। आवाज में क्या खनक; वाह ! तुम्हारा मुस्कुराना ! हँसना, बाप रे !' प्रवीण आज स्नेहा की सुंदरता की तारीफ़ों के पुल बाँधते नहीं थक रहा था। ऊपरवाले ने फुर्सत से बनाया है तुम्हें। वैसे तो मैंने अपनी जिंदगी में बहुत सी लड़कियाँ देखी; पर जो चीज मैंने तुम में देखी, कसम से, वो मुझे किसी और में नहीं दिखी।'
प्रवीण थमने का नाम नहीं ले रहा था, फिर भी 'धत् !' स्नेहा की जुब़ान से निकल गयी। आँखें झुक गयीं। शरमाती हुई बोली- 'बस करो प्रवीण ! मुझे अच्छा नही लगता तुम्हारा यह सब।' स्नेहा ने अपने दोनों हथेलियों से अपना चेहरा ढँक लिया। फिर भी उँगलियों की झीनी दरार से स्नेहा के फूल जैसे होठों का प्रवीण ने दीदार कर ही लिया; और बोला- 'स्नेहा ! आज चलो कहीं एकांत में चलते हैं घूमने। न्यू ईयर भी सेलिब्रेट हो जाएगा। बड़ा मजा आएगा। नाउ लेट्स गो एंड टेक ज्वाॅय डार्लिंग। घोटिया-रानीमाई रूट अच्छा रहेगा, है ना।'  
तभी प्रवीण के उतावलेपन को थामते हुए स्नेहा ने कहा- 'नहीं प्रवीण ! मैं ऐसा नहीं कर सकती। अच्छा नहीं लगता। आजकल हमारा घूमना-फिरना बहुत हो रहा है। हमारे घरवाले भी यह सब जान चुके हैं। फ्रेंड सर्कल में भी हमारी बात फैल चुकी है। लोगों के ताने सुन-सुनकर कान पक गये। आखिर कब तक ऐसा ही चलता रहेगा। प्रवीण, यार पहले हम शादी कर लेते हैं।'
 "'उँ...हूँ...शादी.. शादी.. शादी ! हद हो गयी तुम्हारी। अरी शादी थोड़ी न भागी जा रही है। शादी के बाद इन सब में इन्ज्वॉय नहीं कर पाएँगे पगली..' जैसी शब्दावली के साथ प्रवीण के मदमस्त ओंठ रूपी भ्रमर ने स्नेहा के पुष्प सरीखे अधरों का रसपान कर लिया। स्नेहा की अंतर्देह तरंगित हो उठी; पर उसने स्वयं को बड़ी मुश्किल से सम्भाला, और प्रवीण के बाहुपाश से मुक्त होते हुए चेहरे पर सुर्ख अरूणिमा लिये निकल पड़ी।

लगभग महीने भर बाद स्नेहा का स्कुटी लेकर किसी पारिवारिक काम के सिलसिले डौंडी जाना हुआ। साँझ का समय था। बालोद से निकल कर उसने करीब दस मिनट का का ही सफर तय किया था, तभी सड़क के लेफ्ट साइड जंगल से निकलते हुए दो शख्स दिखाई दिये। नजदीक पहुँचते ही पहचान लिया- प्रवीण था। लड़की अनजान थी। अब तीनों एक-दूसरे के और पास आ गये। सबकी नजरें मिली। किसी ने किसी को कुछ नहीं कहा। खैर वो लड़की अजनबी थी ही, क्या कहती और क्या करती; पर प्रवीण स्नेहा से नजरे चुराने लगा। उस अनजान लड़की के चेहरे से उड़ते रंगत, बिखरे लम्बे-घने केश, होठों की लालिमा का फीकापन, एक इयररिंग का गायब होना इत्यादि; साथ ही प्रवीण का नत किया सर देख स्नेहा को सब कुछ समझने में देर न लगी। किसी को बिना कुछ कहे बोझिल हृदय लिये वह स्कुटी स्टार्ट
 कर निकल पड़ी।
              रास्ते भर स्नेहा का हृदय और बोझिल होता जा रहा था। एक अजीब भय से बदन में सिहरन उत्पन्न हो रही थी। मन में हलचल सी मच रही थी। आँखें डबडबा रही थी। गुजरा गाँव क्राॅस करते ही उसने सुवरबोड़ टर्निंग स्पाॅट पर स्कुटी रोकी; और स्टैंड करके उस पर ही बैठ गयी। दुपट्टे के एक छोर को मुँह में दबा कर सिसकने लगी। नेत्रों से आँसू निरंतर झर रहे थे; लेकिन आखिर यह सब कब तक। उसने तुरंत अपने-आपको सम्भाला; और आँसुओं को अंदर धकेलते हुए डूबते सूरज को प्रणाम किया। देर ही सही, पर आज उसकी आँखें खुल चुकी थी। किसी परिचित अथवा अपरिचित की नजर स्वयं पर पड़े, इससे पहले उसने अपनी स्कुटी स्टार्ट् कर ली।
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- टीकेश्वर सिन्हा 'गब्दीवाला'

1 comment:

  1. बेटियों को सचेत करती सुंदर कथा।

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