खाड़ी संघर्ष और महंगाई

राजीव त्यागी 
खाड़ी में ईरान-अमेरिकी युद्ध से उपजी परिस्थितियों के चलते देश में महंगाई की मार तेज होने की आशंका जताई जा रही है। साथ ही मानव विकास की प्रगति में भी कुछ कमी आ सकती है। दरअसल, पश्चिम एशिया में सैन्य गतिविधियों में वृद्धि से एशिया प्रशांत क्षेत्र में मानव विकास पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा। मिडिल ईस्ट के संकट के चलते ईंधन, मालभाड़ा और कच्चे माल की लागत बढ़ने से लोगों की घरेलू क्रयशक्ति घट रही है, जिससे खाद्य असुरक्षा भी बढ़ रही है। इसके अलावा आजीविका के अवसर कम हो रहे हैं। 
इस संकट में जहां पूरे विश्व में 88 लाख लोगों के गरीबी की चपेट में आने की आशंका है, वहीं भारत में यह अनुमानित संख्या 25 लाख है।निस्संदेह, मालभाड़ा शुल्क, युद्ध जोखिम बीमा, मार्ग परिवर्तन और देरी की वजह से आयातित तेल आदि की कीमतों में वृद्धि हो रही है, जिससे हमारे आयात मूल्य में वृद्धि व निर्यात का नुकसान बढ़ा है। असर हमारी खाद्य सुरक्षा पर भी पड़ रहा है। वहीं खाद की आपूर्ति में बाधा का असर खरीफ की फसल पर पड़ने की आशंका है।



 इस सब के चलते बढ़े दामों का प्रभाव आम आदमी की जेब पर हो रहा है, जिसका रोजगार और आय के मामले में असर बड़ी आबादी पर नजर आ रहा है। हाल ही में नोएडा और मानेसर में श्रमिक असंतोष को इसकी परिणति के रूप में महसूस किया जा सकता है। दरअसल, आवश्यक वस्तुओं की कीमतों में वृद्धि हो रही है। आर्थिक परेशानियों के चलते आम आदमी अब अपने जरूरी खर्चों में कटौती कर रहा है। वजह है उसकी आय के साधन सीमित होना। 

वहीं निम्न आय वर्ग के लोगों में इससे भरण-पोषण का संकट पैदा हो रहा है। श्रमिक असंतोष के बीच आक्रोश उभरा कि महंगाई के अनुपात में उनकी आमदनी नहीं बढ़ रही, फलत: जीवनयापन कठिन होता जा रहा है। सवाल यह है कि आवश्यक वस्तुओं की कीमतों को नियंत्रित करने के प्रयास सिरे क्यों नहीं चढ़ रहे हैं। यदि कदम प्रभावकारी हैं तो फिर महंगाई क्यों बढ़ रही है। वास्तव में खाद्य पदार्थों के दामों में वृद्धि को महंगाई का मुख्य कारण बताया जा रहा है। लोगों की चिंता यह है कि यदि पश्चिम एशिया संकट का शीघ्र समाधान नहीं निकलता है तो महंगाई की मार असहनीय हो सकती है।

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