पर्यावरणीय व्यवस्था में विभिन्न प्रकार के कचरे के कारण बड़ी समस्याएं पैदा होती जा रही हैं। न केवल मनुष्य समाज बल्कि समस्त जीव जगत और वनस्पतियां भी कचरा जनित प्रदूषण का दंश झेलने को अभिशप्त हैं। हवा, पानी और जमीन सब इस प्रदूषण की चपेट में है, जिससे वनस्पति और सारा जीव-जगत बीमारियों और जीवन संकट से गुजर रहा है। भारत भी इससे अछूता नहीं है। भारत में विश्व की 18 फीसदी जनसंख्या निवास करती है और वैश्विक नागरिक अपशिष्ट में भारत की हिस्सेदारी 12 फीसदी है।
भारत प्रति वर्ष 620 लाख टन कचरा पैदा करता है जिसमें से केवल 430 लाख टन ही एकत्रित होता है, और 120 लाख टन ही उपचारित होता है। हालांकि सरकार की ओर से इस दिशा में प्रबंधन के लिए नियम समय-समय पर बनाए जाते रहे हैं, किन्तु खराब क्रियान्वयन के चलते स्थिति में कोई सुधार आता दिखाई नहीं देता है। गरीब बस्तियों के नजदीक डंपिंग, प्रबन्धन और लापरवाहियों से संबंधी डेटा के अभाव के चलते नीति निर्माण और क्रियान्वयन में बाधा होती है। उच्चतम न्यायालय ने इस स्थिति का संज्ञान लेते हुए निर्देश जारी किए कि ठोस कचरा प्रबन्धन नियम 2026 सख्ती से लागू किए जाएं और लापरवाही करने वालों को दंडित करने के भी प्रावधान किए गए।
स्थानीय स्वशासन के सभी निकायों, नगर निकायों और पंचायतों के सदस्यों, प्रधानों, मेयर और कोंसिलर विशेष रूप से नियमों को लागू करने और जागरूकता फैलाने के लिए जिम्मेदार ठहराए गए हैं। यह नियम 1 अप्रैल 2026 से लागू हो गए हैं, किन्तु मुख्य चुनौती तो इन प्रावधानों को सही से लागू करने करवाने की है। कचरा प्रबन्धन नियम तो 2016 से ही लागू हो गए हैं। वर्तमान में उनको अधिक सख्त बनाने का निर्णय स्वागत योग्य है, फिर भी जब तक गंभीरतापूर्वक लागू करने की व्यवस्था खड़ी नहीं की जाती, समस्या बनी ही रहेगी।
जागरूकता इस प्रक्रिया का सबसे महत्वपूर्ण भाग है। हर नागरिक को लगना चाहिए कि वह इन नियमों का पालन करके अपने और अपने परिवार के स्वास्थ्य की रक्षा कर रहा है। पर्यावरण की रक्षा कोई दया-परोपकार का काम नहीं है, बल्कि मेरे अपने ही वर्तमान और दीर्घकालीन जीवन व्यवस्था को सुरक्षित बनाने का काम है। इसके लिए विकेन्द्रित प्रबन्धन प्रणालियां बना कर पंचायत स्तर तक व्यवस्था खड़ी करनी होगी।
विश्वविद्यालयों और स्कूलों में अनुसन्धान और व्यावहारिक पुन:चक्रीकरण कार्यक्रमों के द्वारा जागरूकता फैलाई जानी चाहिए होगी। वरना यह कचरा समुद्री जीवों के विनाश से लेकर जमीन की उपजाऊ शक्ति का ह्रास, और वायु प्रदूषण तथा जल प्रदूषण से जीवन को अधिकाधिक कठिन और रोगी बनाता जाएगा।


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