संस्कारों का संकट


आज का युग तकनीक का युग है, जहां सोशल मीडिया ने सूचना, मनोरंजन और अभिव्यक्ति को हमारी हथेली पर समेट लिया है। फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और टिकटॉक जैसे प्लेटफॉम्र्स ने दुनिया को छोटे-छोटे स्क्रीन्स में कैद कर दिया है। लेकिन यह सुविधा कितनी खतरनाक साबित हो रही है? क्या हम अपने बच्चों को सही संस्कार दे पा रहे हैं, या उन्हें एक ऐसी आभासी दुनिया में अकेला छोड़ रहे हैं जहां वायरल होना ही जीवन का सबसे बड़ा लक्ष्य बन गया है।

 यह प्रश्न अब औपचारिक चिंता नहीं, बल्कि राष्ट्रीय संकट बन चुका है। इन्फ्लुएंसर संस्कृति ने युवाओं की सोच को पूरी तरह बदल दिया है। पहले सफलता का मतलब था परिश्रम, शिक्षा, नैतिकता और मेहनत। आज सफलता का पैमाना व्यूज, लाइक्स, फॉलोअर्स और ट्रेंडिंग है। युवा सोचते हैं कि एक वायरल रील या प्रैंक उन्हें रातोंरात स्टार बना देगा। परिणामस्वरूप, भद्दे प्रैंक्स, अश्लील कंटेंट, विवादास्पद बयान और झूठी खबरों की बाढ़ आ गई है। 

मनोरंजन के नाम पर जो कुछ प्रस्तुत किया जा रहा है, वह समाज के नैतिक ताने-बाने को कमजोर कर रहा है।अध्ययनों से पता चलता है कि सोशल मीडिया पर तीन घंटे से ज्यादा समय बिताने वाले युवाओं में डिप्रेशन और एंग्जायटी का खतरा दोगुना हो जाता है। समाज में बढ़ती असहिष्णुता, आक्रामकता और भावनात्मक असंतुलन इसी का परिणाम है। बच्चों के संस्कार उनके वातावरण से बनते हैं। पहले घर में नैतिक शिक्षा, अनुशासन, बड़ों का सम्मान और संवाद होता था। आज हर घर में मोबाइल है, हर सदस्य अपनी स्क्रीन में खोया है। पारिवारिक संवाद लगभग समाप्त हो चुका है। ऐसे में अभिभावकों की भूमिका अब और महत्वपूर्ण हो गई है।



 बच्चों को मोबाइल के हवाले कर देना घातक है। उन्हें समझाना जरूरी है कि क्या सही है और क्या गलत। माता-पिता को बच्चों के साथ समय बिताना चाहिए, उनकी बात सुननी चाहिए और डिजिटल लिटरेसी सिखानी चाहिए। स्क्रीन टाइम सीमित करना, ऑफलाइन गतिविधियां बढ़ाना और सकारात्मक आदर्श प्रस्तुत करना आज की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। शिक्षा प्रणाली को भी इस चुनौती का सामना करना होगा। स्कूल केवल किताबी ज्ञान नहीं, बल्कि चरित्र निर्माण का केंद्र हैं। पाठ्यक्रम में डिजिटल नैतिकता, साइबर सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य को शामिल करना चाहिए।


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