मौसमों में मौसम आया...!
- ललिता जोशी
“पतझड़ सावन बसंत बहार एक बरस एक बरस के मौसम चार पांचवा मौसम प्यार का” लगता है ये फिल्मी गीत लगता है सारे विश्व के राजनीतिक लोगो ने सुन लिया है । हमारे इन धुरंधरों ने अब छ्ह मौसम बना लिए हैं । चार मौसम तो प्राकृतिक हैं लेकिन अब ये जो पाँचवाँ मौसम है इसे बनाया प्रेमियों ने । कितना खूबसूरत मौसम है ये प्रेमियों का । बस प्यार ही प्यार चारों फिज़ाओं में घुला हुआ और अमन -शांति का माहौल । न किसी को किसी से घृणा ,न ही किसी से ईर्ष्या और द्वेष । पाँचवाँ मौसम प्यार का तो ठीक है । अब हमारे जीवन में दो और मौसमों का प्रवेश हो चुका है । अरे भैये आप सोच रहे होंगे की पगला ही गए हैं। अब ये दो मौसम कौन हैं । छठा मौसम युद्ध का और सातवाँ मौसम चुनाव का ।
राष्ट्रीय स्तर पर पर तो युद्ध का मौसम कभी भी शुरू हो जाता है । एक देश दूसरे का कहा नहीं माने तो बस शुरू हो जाते हैं । पहले तो कुत्ते और बिल्लियों की तरह एक दूसरे को गरियाते हैं अगर इतने बात बन जाये तो ठीक अन्यथा निकालो मिसाइल और दाग दो । इतने पर भी युद्ध पिपासुओं की पिपासा शांत न हो फिर तो कर दो ताबड़तोड़ हमले चाहे वो रिहयशी इलाके हों या फिर अस्पताल या बच्चों के स्कूल कोई फर्क ही नहीं पड़ता । युद्ध के कारण के भी बड़े ही मजेदार हैं जैसे कि अमरीका और इज़राइल की दिमागी खुराफात थी की ईरान के पास परमाणु हथियार है । इस तथ्य की पुष्टि करे या न करे बस बम फोड़ो। ईंधन के स्रोत नष्ट कर दो । जब किसी को शक की बिनाह पर पिटोगे वो भी जवाबी कार्रवाई करगा ही।
ये कोई चोर सिपाही का खेल थोड़ा ही है । चोरी का आरोप लगा और शक के बिनाह पर उठा लिया और बना दिया आरोपी । किसी को कमजोर समझकर उसका टेटुआ दबाने की कोशिश करोगे तो वो भी आत्मरक्षा के लिए पूरे ज़ोर से सामने वाले को गुलाटी देगा । ये गुलाटी गोला-बारूद, मिसाइल, ड्रोन, रॉकेट लौंचर इत्यादि -इत्यादि होते हैं । प्राचीन काल में तो रात में युद्ध नहीं किया जाता था सूर्यास्त के साथ युद्ध समाप्त कर दिया जाता था और अगले दिन सूर्योदय के बाद युद्ध होता की फिर से शुरुआत होती थी ।उस समय युद्ध के कुछ नियम होते थे । अब तो रात में ही आक्रामक हमले किए जाते हैं वो कहावत तो हम सबने सुनी है युद्ध और प्यार में सब जायज है।
इधर ट्रम्प जी युद्ध के लिए उकसाते हैं । एक देश को आप विध्वंसक घोषित कर उसका तो नाश करो तो दूसरी ओर आंतकियों की पौध लगाने वाले पाकिस्तान के शरणागत हैं। ट्रम्प महोदय के ट्रम्पेट बनने पर अन्य देश भी युद्ध की चपेट में आ गए हैं । सारा पश्चिमी एशिया धधक रहा है।अब तो लगने लगा है की युद्ध का मौसम तो वर्षपर्यंत बना रहता है । इसी बहाने सारे देश हथियार खरीदते रहते हैं और आमदनी का जरिया बना रहता है । इस मौसम से कहीं बहार आती है तो कहीं ख़िज़ाँ आती है लेकिन युद्ध के साइडइफ़ेक्ट्स तो सारे देशों को ही भुगतने पड़ते हैं । फिर भी युद्ध का लहू मुंह लगा रहता है । ये तो हुआ हमारा अंतरराष्ट्रीय मौसम । जैसे ग्लोबल वार्मिंग पूरे विश्व को प्रभावित करता है वैसे ही ये युद्ध भी पूरे विश्व को प्रभावित करते हैं ।
अब अपने देश के मौसमों में एक और मौसम आ मिला है वो है मौसमों का राजा “चुनाव” का मौसम । लोकतन्त्र का उत्सव जब -जब अंगड़ाई लेता है तब -तब मन मयूर झूम -झूम कर गाता है ‘मौसम -मौसम ये लवली मौसम’ । अब ये सोचनीय है कि ये मौसम लवली क्यों है भई। अरे चुनावी मौसम आते ही नेतागण सक्रिय हो जाते हैं । चुनावी उम्मीदवार बनते ही इनमें ऐसी ऊर्जा का संचार होता है जो अक्षय होती है । इनकी ऊर्जा देखकर लगता है ये एकदम अपनी युवाव्स्था में हैं । बिना थके ये वंदेभारत ट्रेन की तरह दौड़ लगाते हैं । जनता भी खुश और नेता भी खुश ।
इस लवली मौसम में वादों और सौगातों की वृष्टि नहीं अतिवृष्टि होती है मगर इस अतिवृष्टि से फल मिलते हैं दोनों पक्षों को । जैसे नकद राशि देने की योजना । इस नकदी के लाभार्थी छात्र ,युवा ,महिलाएं और किसान, बुजुर्ग होते हैं । नकड़ी के अलावा बहुत सी कल्याणकारी योजनाएँ जैसे कन्या के जन्म पर योजनाएँ ,फ्री गैस सिलेंडर,फ्री में बस का सफर ,ब्याज मुक्त ऋण ,किसानों को रियायतें और चुनावों वाले राज्यों को अलग से योजनाओं का उपहार । जनता का मुंह इन योजनाओं के लोलिपोप से बंद हो जाता है और इसी में नेताओं को अपनी जीत का रोडमैप नजर आता है ।
पूरा तंत्र इस मंत्र को जपता है । इस में एक चपरासी से लेकर शीर्ष पद पीआर बैठे आला अधिकारियों की भागीदारी होती है । इतना ही इससे आमदनी होती है उन दूकानदारों की जो पार्टी के बिल्ले टोपी एयर झंडे और प्रचार सामग्री छापते हैं । जोश का संचार मीडिया चेनलों में होता है और बीपी पार्टी के अनुयायियों का बढ़ता है । इसीलिए चुनावों की प्रक्रिया चलती रहनी चाहिए और जनता के ध्यान-धारणा में उतरतेरहिए । किसी ने कवि ने कहा भी है “गरीब की थाली में पुलाव आया गया है लगता है शहर में चुनाव आ गया है”। इन मौसमों से हलचल बनी रहती है ।
(मुनिरका एंक्लेव, दिल्ली)






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