अब तेल का खेल
राजीव त्यागी
पश्चिम एशिया लंबे समय से विश्व की ऊर्जा राजनीति का केंद्र रहा है और वहां होने वाला कोई भी सैन्य या राजनीतिक टकराव सीधे वैश्विक तेल बाजार को प्रभावित करता है। इजरायल-अमेरिका और ईरान युद्ध के कारण कच्चे तेल की कीमतों में अचानक आई तेजी इसी संवेदनशीलता का परिणाम है। पिछले कुछ दिनों में अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड की कीमत लगभग 65 डॉलर प्रति बैरल से बढक़र 100 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है।
एलपीजी की तुलना में अब तेल में आग लगने के आसार हैं, जिसकी हकीकत पेट्रोलियम मंत्रालय छिपा रहा है अथवा हरे-भरे आंकड़े पेश किए जा रहे हैं। बार-बार आश्वस्त किया जा रहा है कि पेट्रोल-डीजल के दाम नहीं बढ़ेंगे, जबकि अमरीका, ऑस्टे्रलिया, चीन, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस सरीखे बड़े देशों में पेट्रोल-डीजल महंगे करने पड़े हैं। पाकिस्तान, बांग्लादेश, श्रीलंका जैसे कर्जदार और विपन्न देशों से तुलना क्या करनी? भारत में पेट्रोल की 13 फीसदी और डीजल की 8 फीसदी से अधिक खपत बढ़ी है।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 17 मार्च को 103 डॉलर प्रति बैरल थी, लेकिन भारत ने 108.23 डॉलर के दाम पर तेल खरीदा है। बीती 16 मार्च को इंडियन बास्केट कच्चे तेल की कीमत ने आसमान छू लिया, जो 142.69 डॉलर प्रति बैरल के अनपेक्षित उच्चतम स्तर पर पहुंच गई। फरवरी में कच्चे तेल की कीमत हमें 69 डॉलर पड़ी थी। वह मार्च में औसतन 108.23 डॉलर हो गई। एलपीजी के साथ-साथ तेल की कीमतों का यह उछाल भारतीय अर्थव्यवस्था को डांवाडोल कर सकता है। विशेषज्ञों की मानें तो यदि हमें कच्चा तेल 142 डॉलर की कीमत पर खरीदते रहना पड़ा, तो उससे महंगाई दर 8-10 फीसदी तक उछल सकती है। अभी तो यह 4 फीसदी के करीब बताई जा रही है। भारत की आर्थिक विकास दर लुढक़ कर 4-5 फीसदी पर आ सकती है।
अलग-अलग तिमाही में विकास दर 8 फीसदी से अधिक भी रही है। कुछ ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में अभी से तोरी, भिंडी 150 रुपए किलो और नींबू 200 रुपए किलो बिकने शुरू हो गए हैं। प्याज, टमाटर कब महंगे होने लगेंगे, यह इस पर आश्रित है कि महंगाई दर कितनी बढ़ती है और हर वस्तु का परिवहन का खर्च कितना महंगा होता है? एलपीजी संकट के मद्देनजर औसतन रेस्तरां ने खान-पान के दाम 57 फीसदी तक बढ़ा दिए हैं। स्ट्रीट फूड भी 25 फीसदी महंगा हो गया है, लिहाजा आम आदमी पिसने लगा है।
सूखे मेवे के दाम 25-45 फीसदी, खाद्य तेल के दाम 20 रुपए प्रति लीटर, दवाइयों के दाम 30 फीसदी तक बढ़ गए हैं। इलेक्ट्रॉनिक्स का सामान भी महंगा हुआ है। विमानन कंपनियों ने भी ‘फ्यूल सरचार्ज’ थोप दिए हैं। इस तरह खुदरा और थोक महंगाई दरें बढऩी तय लग रही हैं। हालांकि सरकार से उम्मीद है कि वह चालू वर्ष में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.4 फीसदी राजकोषीय घाटे का लक्ष्य हासिल करेगी। चुनौती केंद्र सरकार के सामने ही है कि वह पेट्रोल-डीजल के दाम कब तक बढ़ाने के निर्देश नहीं देगी? कच्चे तेल की कीमतें तो तमाम हदें पार कर चुकी हैं। हमारे दो जहाज भारतीय बंदरगाहों पर आ चुके हैं, जिनमें 92,700 मीट्रिक टन एलपीजी है। यह तो मात्र एक दिन की खपत के बराबर गैस है। अभी हमारे 22 और जहाज पश्चिमी खाड़ी में फंसे हैं।





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