राजीव त्यागी
आज हर देश अपनी सुरक्षा के नाम पर हथियार खरीद रहा है, सेना को मजबूत कर रहा है और सैन्य बजट बढ़ा रहा है। यह एक ऐसी दौड़ बन गई है जिसमें कोई भी देश पीछे नहीं रहना चाहता। लेकिन विडंबना यह है कि जितने अधिक हथियार बढ़ रहे हैं, दुनिया उतनी ही असुरक्षित होती जा रही है।
सुरक्षा की यह मानसिकता वास्तव में असुरक्षा का ही परिणाम है। एक देश हथियार बढ़ाता है तो दूसरा देश भी हथियार बढ़ाता है और इस तरह एक अविश्वास का वातावरण बन जाता है। यह अविश्वास ही युद्ध की जमीन तैयार करता है। विशेषज्ञों का अनुमान है कि आने वाले वर्षों में दुनिया का सैन्य खर्च कई गुना बढ़ जाएगा और यह पैसा मानव विकास के बजाय विनाश की तैयारी में खर्च होगा। यह स्थिति मानव सभ्यता के लिए शुभ संकेत नहीं है। पश्चिम एशिया का संकट इस समय दुनिया के लिए सबसे बड़ा खतरा बनता दिखाई दे रहा है।
दरअसल, दुनिया की अर्थव्यवस्था का बड़ा हिस्सा तेल और गैस पर निर्भर है और पश्चिम एशिया तेल उत्पादन का सबसे बड़ा क्षेत्र है। यदि वहां युद्ध बढ़ता है या समुद्री मार्ग बाधित होते हैं तो तेल की कीमतें तेजी से बढ़ेंगी। तेल महंगा होगा तो पेट्रोल-डीजल महंगा होगा, परिवहन महंगा होगा, उत्पादन लागत बढ़ेगी और अंततः हर वस्तु महंगी हो जाएगी। यानी एक वैश्विक महंगाई का दौर शुरू हो सकता है। महंगाई बढ़ने से गरीब और मध्यम वर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित होगा। इसी खतरे को देखते हुए भारत सरकार ने ऊर्जा आपूर्ति, पेट्रोल-डीजल, गैस और उर्वरकों की उपलब्धता बनाए रखने को लेकर तैयारी शुरू कर दी है।
इस पूरे परिदृश्य में सबसे बड़ी चिंता यह है कि दुनिया युद्ध को रोकने के बजाय उसकी तैयारी ज्यादा कर रही है। युद्ध शुरू करना आसान होता है, लेकिन उसे रोकना बहुत कठिन होता है। आज भी यदि पश्चिम एशिया का युद्ध फैलता है तो यह केवल दो या तीन देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि बड़े देशों की भागीदारी से यह वैश्विक संघर्ष का रूप ले सकता है।
इसलिए यह जरूरी हो गया है कि विश्व के बड़े देश आगे बढ़कर युद्ध विराम की पहल करें और वार्ता का रास्ता निकालें। युद्ध में सैनिक मरते हैं, नागरिक मरते हैं, शहर बर्बाद होते हैं, अर्थव्यवस्था टूटती है और आने वाली पीढ़ियां तक उसके दुष्परिणाम झेलती हैं। इसलिए आज दुनिया को हथियारों की दौड़ नहीं, शांति की दौड़ की जरूरत है।

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