समानता का हो विस्तार
 इलमा अज़ीम 
 आज वैश्विक स्तर पर असमानताओं की खाई कई रूपों में दिखाई देती है। एक ओर तकनीकी क्रांति और कृत्रिम बुद्धिमत्ता रोजगार के नए अवसर सृजित कर रही है, तो दूसरी ओर पारंपरिक श्रम-आधारित रोजगार असुरक्षित होते जा रहे हैं। 
डिजिटल विभाजन नई सामाजिक दूरी का कारण बन रहा है। ग्रामीण और शहरी, विकसित और विकासशील, पुरुष और महिला, सक्षम और दिव्यांग-इन सबके बीच संसाधनों की असमान पहुंच सामाजिक तनाव को जन्म देती है। ऐसे समय में सामाजिक न्याय का अर्थ है इन अंतरों को पहचानना और उन्हें पाटने के लिए लक्षित, संवेदनशील और पारदर्शी नीतियों का निर्माण करना। सम्मानजनक कार्य की अवधारणा भी सामाजिक न्याय के केंद्र में है। केवल रोजगार उपलब्ध कराना पर्याप्त नहीं, बल्कि ऐसा कार्य-संस्कृति बनाना आवश्यक है जिसमें उचित वेतन, सुरक्षित कार्य-परिस्थितियां और श्रमिकों के अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित हो।
 आर्थिक विकास तभी टिकाऊ हो सकता है जब वह मानव गरिमा के साथ जुड़ा हो। यदि विकास केवल आंकड़ों में सीमित रह जाए और आम नागरिक के जीवन में राहत न ला सके, तो वह विकास नहीं, केवल विस्तार है। भारतीय संविधान ने समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के सिद्धांतों के माध्यम से एक ऐसे समाज की कल्पना की है जहां जाति, धर्म, लिंग या वर्ग के आधार पर भेदभाव न हो।

 आज भी सामाजिक न्याय का प्रश्न केवल आर्थिक असमानता तक सीमित नहीं है; यह सामाजिक पूर्वाग्रहों, लैंगिक भेदभाव, क्षेत्रीय असंतुलन और सांस्कृतिक असमानताओं से भी जुड़ा है। आज आवश्यकता है कि सामाजिक न्याय को केवल राजनीतिक नारे के रूप में नहीं, बल्कि नैतिक दायित्व के रूप में देखा जाए। सामाजिक न्याय के लिए सामाजिक एकता भंग नहीं की जा सकती। शासन और प्रशासन की प्रत्येक नीति का अंतिम लक्ष्य मानव कल्याण होना चाहिए। यदि शक्ति के स्रोत जनहित में प्रयुक्त न हों, तो वे असंतोष और अविश्वास को जन्म देते हैं। 

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