गोद लेने वाली मां भी मातृत्व अवकाश की हकदारः सुप्रीम कोर्ट

 मातृत्व अवकाश पर सुप्रीमकोर्ट का अहम फैसला
नई दिल्ली (एजेंसी)।
सुप्रीम कोर्ट ने मातृत्व संरक्षण को लेकर मंगलवार को बड़ा फैसला सुनाया है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मातृत्व संरक्षण एक मौलिक मानवाधिकार है, जिसे बच्चे के जन्म के तरीके के आधार पर छीना नहीं जा सकता।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट ने सामाजिक सुरक्षा संहिता की उस धारा को असंवैधानिक करार दिया जो केवल 3 महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेने पर अवकाश की अनुमति देती थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि तीन महीने से अधिक उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली महिला को मातृत्व अवकाश से वंचित नहीं किया जा सकता है। कोर्ट ने कहा कि मातृत्व संरक्षण एक मूलभूत मानवाधिकार है और परिवार बनाने के एक 'गोद लिया हुआ बच्चा' और 'जैविक बच्चा' कानून की नजर में समान हैं।
न्यायमूर्ति जेबी परदीवाला और न्यायमूर्ति आर महादेवन की पीठ ने एक याचिका पर सुनवाई के दौरान कहा, "यद्यपि पारंपरिक रूप से रिश्तेदारी को परिभाषित करने में जीव विज्ञान को प्रमुख कारक माना जाता रहा है, लेकिन गोद लेना भी उतना ही मान्य तरीका है।
परिवार का निर्धारण जीव विज्ञान से नहीं, बल्कि साझा अर्थ से होता है। केवल जैविक कारक ही परिवार को निर्धारित नहीं करते। गोद लिया हुआ बच्चा प्राकृतिक बच्चे से भिन्न नहीं होता।"
सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि तीन महीने से अधिक उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली महिला की जिम्मेदारी अन्य मां के समान ही होती है। इसलिए उन्हें भी मैटरनिटी लीव मिलेगी।

दरअसल, कर्नाटक की वकील हंसानंदिनी नंदूरी ने इस प्रावधान को चुनौती दी थी। उन्होंने 2017 में दो बच्चों को गोद लिया था, एक साढ़े चार साल की लड़की और उसका दो साल का भाई। जब उन्होंने अपने नियोक्ता से मातृत्व अवकाश मांगा, तो उन्हें बताया गया कि उन्हें प्रत्येक बच्चे के लिए केवल छह सप्ताह की छुट्टी मिलेगी, क्योंकि बच्चे तीन महीने की उम्र की सीमा पूरी नहीं करते। नंदूरी ने याचिका में कहा कि कानून गोद लेने वाली माताओं और बच्चों के साथ भेदभाव करता है। उन्होंने तर्क दिया कि यह अन्यायपूर्ण, मनमाना और असंवैधानिक है।

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