दोहरी भूमिका
'बहू...! तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई अपनी सीमा लाँघने की। तुम कौन हो, क्या हो , तुम्हें समझना चाहिए। जाओ, घर के अंदर; और हाँ, आज अपने कमरे से बाहर नहीं निकलना।' नंदा जी ने अपनी मँझली बहू ऋतु को आँखें तरेरती हुई बोली।
सासू माँ की दबंगई देख ऋतु काँप गयी। झट से वह कमरे के अंदर गयी। दोष उसका इतना था कि उसने बार-बार मना करने पर भी 'होली है भाई होली है...बुरा न मानो होली है...मँझली भाभी होली है...' करते हुए अपनी नंनद प्रिया को अपने माथे व दोनों गालों पर गुलाल लगवाने से नहीं रोक पायी थी। तुरंत प्रिया बोली- 'माँ जी! आखिर मँझली भाभी के लिए इतना पाबंदी क्यों? वह भी तो जीती-जागती इंसान है, कोई बेजान वस्तु तो नहीं। गीतू..., तू भी इधर आ। दिन भर मम्मी से चिपकी रहती है। चल मैं तुम्हें तुम्हारी सहेलियों के पास ले चलती हूँ होली खेलने।'
प्रिया गीतू को लेकर घर से निकल ही रही थी कि नंदा जी ने प्रिया की बाँह पकड़ कर उसे झटकारा- 'बेवकूफ लड़की, अब तू इतनी बड़ी हो गयी कि मुझसे जुबान लड़ाएगी; मुझे समझाएगी। इस घर में किसे क्या करना है; ये मैं तय करूँगी, तू नहीं; समझी।' नंदा जी का तेवर देख घर के सभी सदस्य दुबक गये। किसी ने भी कुछ कहना उचित नहीं समझा।
बरामदे पर खड़ी नंदा जी फुंकार रही थी- 'हाँ...., सभी ध्यान से सुनें मेरी बात। ऋतु होली के रंग-गुलाल से बिल्कुल दूर रहेगी, क्योंकि वह विधवा है। जिसका पति नहीं, उसका कुछ नहीं। यह सब व्यर्थ है उसके लिए। उसे अपने तन तो क्या, आँचल को भी रंगने से बचाना है। सादे लिबास का दायरा ही अब उसका घर-संसार है।' नंदा जी खामोश हुई।
दूसरे दिन भाईदूज था। मालवीय नगर के लोहिया काॅलोनी में महिलाओं ने होली मिलन समारोह का आयोजन किया। उस भव्य समारोह में चीफ गेस्ट थी- मिसेज़ नंदा ठाकुर। उनका चीफ गेस्ट होना लाजिमी था; महिला बाल विकास समिति का अध्यक्ष जो थी।
फूलमालाओं से लदी मिसेज़ नंदा जी अपने मुख्यातिथ्य उद्बोधन में कह रही थीं- 'मेरी प्यारी बहनों ! हम इक्कीसवीं सदी की महिलाएँ हैं। हम भी स्वंतत्र भारत के स्वतंत्र नागरिक हैं। वो दिन अब हवा हुए, जब औरतें परवश होकर जीवन जीया करती थीं। अब हर घर की औरत , चाहे वो किसी भी उम्र की हो, चाहे वो बेटी हो , बहू हो; और चाहे वो किसी भी परिस्थिति में हो, उन्हें स्वतंत्र जीवन जीने का पूर्ण अधिकार है। बहनों, हमारी सरकार का 'बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ' अभियान के अनुरूप हमें अपना कार्य करना है। अब हमें हर बेटी, चाहे वो उम्रदराज कुवाँरी, परित्यक्ता या फिर विधवा बहू हो, सबको मानवीय जीवन जीने का हक दिलाना है, तभी हर बेटी, हर बहू, हर माँ और हर औरत को समाज में यथोचित सम्मान मिल पाएगा।'
मिसेज़ नंदा जी की विचाराभिव्यक्ति जारी ही थी; तभी अचानक वह प्रिया को तेज कदमों के साथ अपनी ओर आते देख सहम गयी; और फिर झट से 'इतना कह कर मैं अपनी वाणी को विराम देती हूँ', कहते हुए बैठ गयी।
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- टीकेश्वर सिन्हा 'गब्दीवाला'।





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