रंग वही जो...!

रंग वही जो गहरा होता
लगे कहीं तो ठहरा होता!

उसने तो ये हद ही कर दी
लगा दिया जो मिटे न जल्दी
थोड़ा कम ही रगड़ा होता
रंग वही जो गहरा होता
लगे कहीं तो ठहरा होता!

चेहरे पर हो कभी उदासी
चलो घूम लें मथुरा-काशी
सदा प्रेम ना झगड़ा होता
रंग वही जो गहरा होता
लगे कहीं तो ठहरा होता!

जनता भूखी रहे या प्यासी
रंगों की पहचान सियासी
इक दूजे पर पहरा होता
रंग वही जो गहरा होता
लगे कहीं तो ठहरा होता!
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- राजेश पाठक, गिरिडीह, झारखंड।

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