खूनी फाइल


- डॉ. सुरेश कुमार मिश्रा 'उरतृप्त'
कबाड़ागंज से लगभग दो कोस दूर, विकासखंड के उस दफ्तर में सन्नाटा ऐसा था जैसे किसी ने लोकतंत्र की आत्मा पर रजाई डाल दी हो। मेज पर धरी फाइलों के बीच एक ऐसी फाइल दबी थी, जिसका शीर्षक था—"ग्राम कल्याण हेतु अदृश्य शक्तियों का विनियोग।" साहब, यानी हमारे आधुनिक कुबेर, कुर्सी पर इस तरह विराजमान थे जैसे कोई कछुआ अपनी खोल में घुसकर ब्रह्मांड के रहस्यों पर विचार कर रहा हो। अचानक टेलीफोन की घंटी बजी। यह घंटी नहीं थी, साक्षात यमराज का बुलावा था। ऊपर से आदेश था—"आज रात ठीक बारह बजे, उस फाइल का रहस्योद्घाटन होगा। खबर है कि विदेशी जासूस उसे उड़ाने आ रहे हैं।"

दफ्तर में केवल तीन प्राणी थे: एक साहब, दूसरा चपरासी घसीटा, और तीसरा वह खटमल जो साहब की कुर्सी के हत्थे में पिछले तीन पंचवर्षीय योजनाओं से निवास कर रहा था। घसीटा ने बीड़ी का कश खींचते हुए कहा, "साहब, जासूस आएगा तो क्या हम उसे जलपान कराएंगे या सीधे लठियाएंगे?" साहब ने अपनी प्रशासनिक गरिमा को फालिज की मार से बचाते हुए कहा, "मूर्ख, यह राष्ट्रीय सुरक्षा का मामला है। फाइल में वह नक्शा है जिससे पता चलेगा कि गाँव की वह सड़क कहाँ गई जो कागजों पर तो बन गई, पर जमीन पर आज भी पाताल लोक का मार्ग ढूंढ रही है।"

जैसे-जैसे रात गहराती गई, रोमांच का पारा चढ़ने लगा। दफ्तर की खिड़की खड़खड़ाई। घसीटा ने टॉर्च जलाई, पर रोशनी ने केवल मकड़ी के जालों को और डरावना बना दिया। तभी एक साया कमरे में दाखिल हुआ। वह काला लबादा ओढ़े था, आँखों पर चश्मा था और चाल ऐसी कि हवा भी रास्ता बदल ले। साया सीधे उस मेज की ओर बढ़ा जहाँ वह 'रहस्यमयी फाइल' रखी थी। साहब डर के मारे मेज के नीचे घुस गए, जहाँ उनकी मुलाकात उसी पुराने खटमल से हुई। घसीटा ने बहादुरी का परिचय देते हुए अपनी धोती कस ली।

"ठहरो!" घसीटा चिल्लाया, "इस फाइल को हाथ लगाया तो समझो विकासखंड का सत्यानाश हो जाएगा!" काला साया रुका। उसकी आवाज भारी और यंत्रवत थी, "मुझे वह नक्शा चाहिए। वह रहस्य, जिसे तुमने दुनिया से छिपा रखा है।" साहब मेज के नीचे से बोले, "ले जाओ भाई! ले जाओ! वैसे भी उस सड़क का ठेका जिस ठेकेदार ने लिया था, वह अब खुद को साधु घोषित कर चुका है। तुम नक्शा लेकर भी सिर्फ गड्ढे ही पाओगे।" पर जासूस अड़ा रहा। उसने फाइल झपटी। घसीटा और जासूस के बीच हाथापाई शुरू हुई। टॉर्च गिर गई। अंधेरे में केवल 'धप-धप' और 'साँय-साँय' की आवाजें आ रही थीं। ऐसा लग रहा था जैसे भारत और चीन का युद्ध इसी दस-बाई-दस के कमरे में सिमट आया हो। अचानक एक जोरदार धमाका हुआ! साहब चिल्लाए, "बम गिर गया! लोकतंत्र खत्म!"

तभी बिजली आ गई। कमरे का दृश्य कुछ ऐसा था कि विधाता भी अपनी कलम रोक दें। काला साया जमीन पर गिरा था। उसका लबादा उतर चुका था। वह कोई जासूस नहीं, बल्कि पास के गाँव का 'भुलई' था, जो रात के अंधेरे में अपनी पेंशन की फाइल ढूंढने आया था। और वह धमाका? वह धमाका बम का नहीं, बल्कि साहब की मेज पर रखे उस पुराने 'ग्लोब' के फटने का था, जिसे घसीटा ने जासूस के सिर पर दे मारा था।

पर असली तमाशा तो अब शुरू हुआ। जब भुलई के हाथ से वह 'अदृश्य शक्ति' वाली फाइल गिरी और खुली, तो उसमें से कोई नक्शा नहीं निकला। उसमें से निकले 'चूहे मारने की दवा के तीन साल पुराने बिल' और एक प्रेम पत्र, जो साहब ने अपनी जवानी में ब्लॉक प्रमुख की साली को लिखा था और जिसे वे 'अति गोपनीय' मानकर सरकारी फाइल में दबाए बैठे थे।
साहब मेज के नीचे से बाहर निकले, अपनी कमीज झाड़ी और बड़ी ठसक से बोले, "देखा घसीटा! इसे कहते हैं काउंटर-इंटेलिजेंस। हमने दुश्मन को चूहे मारने की दवा के बिल में उलझा दिया ताकि वह असली भ्रष्टाचार तक न पहुँच सके। राष्ट्र सुरक्षित है!"
भुलई अपनी फटी पेंशन की अर्जी लेकर रोता हुआ बाहर निकल गया। घसीटा ने फिर बीड़ी सुलगा ली और साहब फिर से उस कुर्सी पर फिट हो गए जहाँ वह खटमल उनका स्वागत करने को बेताब था।

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