प्रेम के रंग देख हुए दंग
- ललिता जोशी
वैसे तो वर्ष का प्रत्येक महीना अपने आप में अद्भुत होता है । फरवरी का महीना अपने देश में दो कारणों से मशहूर है एक बजट प्रस्तुति के लिए । संसद में बजट पेश किया जाता है तो संसद में हंगामा होता है । यहाँ हंगामा करते हैं चुने हुए सांसद। बजट का हंगामा थमता नहीं कि तब तक प्रेम का त्योहार दस्तक दे देता है । इश्क का ये त्योहार साप्ताहिक त्योहार है । ये अंतरराष्ट्रीय स्तर का त्योहार है । इसकी शुरुआत होती है रोज डे से । अपने साथी को गुलाब देने के साथ हो जाती है और फिर प्रपोज डे ,चॉकलेट डे ,प्रोमिस डे ,हग डे ,किस डे और अंतिम दिवस वेलेंटाइन डे के रूप में परिपूर्ण होत है प्रेम के पुजारियों का ये त्योहार ।
कमाल देखिये इस त्योहार का कि फरवरी की गुलाबी ठंड में प्रेमियों का जोश अपने चरम पर आ जाता है। क्या जादू है इस महीने का राजनीतिज्ञों और प्रेमियों पर बराबर का जुनून सवार रहता है । बजट और प्रेम दोनों ही बाजार को अपनी पकड़ में जकड़ कर रखते हैं। बजट बाजार में उछाल लाता है या फिर गिरावट लेकिन प्रेम का त्योहार बाज़ार में चमक और व्यापार लाता है । इन सात दिनों में बाजार गुलाबसे गुलज़ार होते हैं और करोडों रुपये के उपहारों से पटे रहते हैं । जिसकी जेब की जैसी शक्ति उसकी प्रेम में उपहार प्रदान की भक्ति । अपने उत्पादों की बिक्री के लिए उत्पाद कंपनियाँ जो करें वो कम है । आज एक चोकलेट कंपनी ने अपने विज्ञापन के लिए जानवरों को ही अपने प्रेम को पुख्ता करने के लिए दिल का आकर वाले चॉकलेट के टुकड़े खिला कर रोमानी होते हुए दिखा दिया । तो कोई दिल के आकार के जेवर बेच रहे तो कही घड़ियाँ ,विभिन्न परिधान ये सब इतने पर नहीं थमता अब अंत:वस्त्र भी प्रेम के उपहार स्वरूप ।
इजहारे इश्क का प्रदर्शन जितना प्रचंड इन व्यापारियों ने करवा दिया है उतना ही बिक्री अपने शिखर पर । जिनके पास धन है उनका प्रेम अनंत और अपार । इस सप्ताह में इतना अपार प्रेम उमड़ता है । तो लगता है की सारा विश्व प्रेम सागर में आकंठ डूबा है तो कहीं हिंसा होनी ही नहीं चाहिए । एक तरफ तो प्यार का तूफान दूसरी और प्रेम में धोखा देना भी आम बात हो गई है । प्रेम में प्रेमी प्रेमिका के कर डाले 36 टुकड़े और जो लड़की करे प्रेम विवाह वही अपने पति की लाश को नीले ड्रम में सीमेंट लगा कर पैक कर दे वो बच्चे के सामने । कैसा है ये इश्क या प्रेम ।
रहीम जी ने कहा है--
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोरो चटकाय ।
टूटे पे फिर ना जुरे, जुरे गांठ परि जाय ॥
ये है प्रेम की नजाकत और अहसास । आजकल तो प्रेम भी दिखावटी और सजावटी हो गया है । आजकल चाहे निब्बा हो या निब्बी सभी को प्रेम रोग पेंडेमिक की तरह लगा हुआ है । किसी ने ठीक ही कहा है कि “प्रेम को पाया नहीं ,जिया जाता है ।“
आजकल तो प्रेम नहीं मिले तो उसे उड़ा दो । यानि जो मेरा नहीं वो किसी का भी नहीं । फैशन के इस दौर में जैसे रंगों की कोई गारंटी नहीं होती वैसे ही एआई के इस दौर में संबंधों की विश्वसनीयता की कोई गारंटी नहीं । चमक दमक और बाजारवाद के इस दौर में टिकाऊ चीजें नहीं ,खाना -पीना मिलावटी ,स्वास्थ्य खराब ,हवा जहरीली ,पानी जहरीला । इस दौर का प्रेम क्या होगा । अखबारों के आंकड़ों से सभी को मालूम प्रेम क्या है और क्या चल रहा है ।
प्यार को प्यार रहने दो इसे बाजार में मत खोज
(मुनिरका एंक्लेव, दिल्ली)



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