बढ़ते शहरीकरण के खतरे
भारत में बढ़ता शहरीकरण भले ही विकास का आधार हो, लेकिन इसने अनेक समस्याओं को भी जन्म दिया है। बढ़ता शहरीकरण केवल भारत ही नहीं, बल्कि दुनिया के लिये एक बड़ी चुनौती बन रहा है। वर्तमान में दुनिया की कुल आबादी में से 56 फीसदी आबादी शहरों में रहने लगी है। गांवों से शहरों की ओर पलायन हो रहा है। यह प्रवृत्ति जारी रही तो 2050 तक शहरी आबादी अपने वर्तमान आकार से दोगुनी से भी अधिक हो जाएगी।
भारत को दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थ-व्यवस्था बनाने एवं नया भारत-विकसित भारत बनाने के लिये शहरीकरण पर बल दिया जा रहा है। शहरी विकास की इस प्रक्रिया ने गाँवों के सामने अस्तित्व का संकट उत्पन्न कर दिया है। शहरों का अनियोजित विकास, महानगरों का असुरक्षित परिवेश, पर्यावरण की समस्या, बढ़ता प्रदूषण, जल का अभाव एवं शहरी संस्कृति में बढ़ते जा रहे संबंधमूलक तनाव हमें यह सोचने पर विवश करते हैं कि शहरी विकास की अवधारणा पर एक बार फिर से विचार किया जाना चाहिये।
इसमें दो राय नहीं कि शहरीकरण को विकास का पैमाना माना जाता है। शहरों में गांवों की तुलना में अधिक साधन, सुविधाएं, रोजगार, स्वास्थ्य, शिक्षा दूसरे शब्दों में आधारभूत सुविधाएं अधिक होती हैं। यह भी सच है कि ये सुविधाएं सभी को नसीब भी नहीं होतीं। रोजगार के लिए गांवों से शहरों में आने वाले बहुत सारे लोगों को कच्ची बस्तियों, चालों या एक से दो कमरें के मकानों में किराए पर रहने को बाध्य होना पड़ता है।
शहरों में बुनियादी सुविधाओं के बावजूद सामाजिक और पर्यावरणीय क्षेत्र पर खासा नकारात्मक प्रभाव देखा जा सकता है। शहरों में रहना दूभर ही होता जा रहा है। असल में देखें तो संकट वायु प्रदूषण का हो या जंगल का, स्वच्छ वायु का हो या फिर स्वच्छ जल का, सभी के मूल में विकास की वह अवधारणा है जिससे शहर रूपी सुरसा सतत विस्तार कर रही है और उसकी चपेट में आ रही है प्रकृति और उसकी नैसर्गिकता। जिसके कारण मनुष्य की सांसें उलझती जा रही है, जीवन पर संकट मंडरा रहा है। अगर हमें पूरी समस्या से लड़ना है, तो राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली सहित महानगरों के स्तर पर और साथ ही पूरे देश के स्तर पर अपनी कई आदतों को बदलना होगा।





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