डिजिटल चक्रव्यूह में फंसा बचपन

सपना सी.पी. साहू 'स्वप्निल'

गाजियाबाद की त्रासदी जिसमें आनलाइन गेम का टास्क पूरा करते हुए तीन किशोरियां जो आपस में सगी बहनें थी, उन्होंने नौवीं मंजिल से छलांग लगा दी। यह महज दुखद दुर्घटना नहीं, बल्कि हमारे भारतीय समाज के डिजिटल संक्रमण की ऐसी इच्छा मृत्यु है जिसे प्रगति के नाम पर देश की भावी पीढ़ी खुद चाह रही है। इस घटना की प्रारंभिक जांच में जब कोरियन लव गेम का नाम सामने आया, तो एक बार फिर यह स्पष्ट हो गया कि हम जिस इंटरनेट को ज्ञान का सागर समझ रहे थे, वह तो हर रोज का डेथ वारंट है। उसमें घातक खेलों का ऐसा दलदल भी है जो बच्चों की कोमल संवेदनाओं को निगल रहा है। यह हादसा तकनीक के गलत उपयोग से कहीं ज्यादा माता-पिता की अनदेखी और परिवारों के बीच बढ़ती भावनात्मक शून्यता का जीवंत उदाहरण है।

बच्चों में ​डिजिटल एडिक्शन ड्रग्स से भी अधिक घातक साइलेंट किलर की तरह घुसपैठ कर रहा है। यह डिजिटल नशा बच्चों का भविष्य खा रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा गेमिंग डिसऑर्डर को मानसिक बीमारी की सूची में डालना इस बात का पुख्ता प्रमाण है कि यह समस्या अब नियंत्रण से बाहर हो रही है। आंकड़ों पर गौर करें तो भारत में लगभग 45 करोड़ से अधिक सक्रिय ऑनलाइन गेमर्स हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि इनमें से एक बहुत बड़ा हिस्सा 15 से 25 वर्ष की आयु के युवाओं और किशोरों का है। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो की हालिया रिपोर्ट्स भी संकेत देती हैं कि किशोरों में बढ़ते तनाव और आत्महत्या की घटनाओं के पीछे साइबर बुलिंग और गेमिंग चैलेंज जैसे कारक प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं।

​मनोवैज्ञानिक रूप से समझें तो जब बच्चा घंटों स्क्रीन से चिपका रहता है, तो उसके मस्तिष्क में डोपामाइन नामक रसायन का अत्यधिक स्राव होता है। जो उसे झूठा रोमांच और आभासी खुशी देता है। जैसे ही उसका वास्तविकता से सामना होता है या उससे फोन छीन लिया जाता है, वही बच्चा अचानक अवसाद, चिड़चिड़ेपन या हिंसक व्यवहार का ग्रस्त हो जाता है।

​आज माता-पिता जितने स्मार्ट बन रहे है, बचपन उतना अकेला होते जा रहा है। विडंबना है माता-पिता बच्चों को चुप कराने या व्यस्त रखने के लिए हाथ में मोबाइल थमा देते हैं। आज डिजिटल पेरेंटिंग का अर्थ केवल इंटरनेट पैक डलवाना रह गया है। माता-पिता स्वयं भी इस चक्रव्यूह से मुक्त नहीं हैं। वे दूसरों को व्हाट्सएप पर सुप्रभात और संस्कारों के संदेश भेजने में घंटों व्यतीत करते हैं, लेकिन बगल में बैठे अपने बच्चे की आंखों में पसरे सन्नाटे को नहीं पढ़ पाते। जब घर का वातावरण ऐसा हो जाए जहां हर सदस्य अपनी-अपनी स्क्रीन में कैद हो, तो बच्चे स्वाभाविक रूप से भावनात्मक अकेलापन महसूस करते हैं। बच्चे मोबाइल नहीं मांगते, वे आपका समय मांगते हैं। जब उन्हें समय नहीं मिलता, तब वे मोबाइल का विकल्प चुनते हैं। और अजनबियों, लव गेम्स जैसे खतरनाक प्लेटफार्मों की शरण में जाते हैं, जहां उन्हें महत्व मिलने का भ्रम होता है।

​ऑनलाइन गेम्स भ्रमजाल है। ​गाजियाबाद की घटना में जिस गेम का जिक्र आया है, वह बच्चों की मनोवैज्ञानिक कमजोरी और प्रेम की इच्छा का फायदा उठाता है। ये गेम्स किशोरों को धीरे-धीरे वास्तविकता से काट देते हैं और उन्हें ऐसे टास्क में उलझा देते हैं जहां मृत्यु उन्हें डरावनी नहीं, बल्कि रोमांचक चुनौती या मुक्ति मार्ग लगने लगती है। सामाजिक मेलजोल की कमी के कारण बच्चों में तुलना और प्रतिस्पर्धा का भाव इतना बढ़ जाता है कि वे अपनी हार को बर्दाश्त नहीं कर पाते और आत्मघाती कदम उठा लेते हैं।

भारत में तेलंगाना में ही 1023 मृत्यु के मामले 2025 में और पूरे भारत में 32 मामले पैसे वाले गेम में आत्महत्या के दर्ज हुए है। विशेषज्ञों का मानना है यह आंकड़ा और भी बड़ा है। इसके लिए समाधान की राह चुननी होगी। बच्चों को पाबंदी से नहीं, प्रेम और संवाद के जरिए समझाना होना। कंट्रोल नहीं कनेक्ट को अपनाना होगा। बच्चे नियम थोपने या अचानक मोबाइल छीनने से विद्रोही बन सकते हैं। समाधान निम्नलिखित बिंदुओं में निहित है:-

#​ डिजिटल डिटॉक्स और पारिवारिक समय जिसमें घर में कम से कम एक घंटा ऐसा हो जहां कोई भी सदस्य फोन का उपयोग न करे। बल्कि साथ भोजन करे और एक-दूसरे के अनुभव सुने।

# ​बच्चों के व्यवहार के सूक्ष्म संकेतों को पहचानें। यदि बच्चा अचानक चुप रहे, उसे नींद न आए, वह अंधेरे कमरे में समय बिताए या उसकी भूख कम हो, तो ये चिंतनीय हैं। उसे जासूसी के लहजे में नहीं, बल्कि मित्र की तरह बात करें।

# ​सक्रिय निगरानी और तकनीकी शिक्षा स्वयं माता-पिता को समझनी होगी। बच्चा क्या देख रहा है जाने लेकिन इसे बच्चे की निजता का सम्मान के साथ सुरक्षा कवच की तरह लागू करें।

# ​शारीरिक गतिविधियों को बढ़ावा दें। आभासी दुनिया की जीत से बेहतर है मैदान की हार है। बच्चों को खेलकूद, चित्रकारी, संगीत जैसी रचनात्मक गतिविधियों से जोड़ें ताकि उनका डोपामाइन स्तर प्राकृतिक रूप से संतुलित रहे।



​आज जागना अनिवार्य है। ​गाजियाबाद की वह नौवीं मंजिल केवल ईंट-पत्थरों का हिस्सा नहीं थी, बल्कि वह हमारी गिरती हुई पारिवारिक संवेदनाओं का प्रतीक थी। कोई ऐप, कोई रील्स या कोई गेम अपने बच्चों के जीवन से अधिक कीमती नहीं है। यदि हम आज अपने बच्चों के लिए उपस्थित नहीं हुए, तो कल हम उन्हें हमेशा के लिए खो सकते हैं। याद रखिए, बच्चों को महंगे गैजेट्स से अधिक माता-पिता के समय और स्पर्श की आवश्यकता है।

​सचेत रहें, संवाद बनाए रखें और अपने घर को फिर से भावनाओं का घर बनाएं, डिजिटल टापू नहीं।

स्वरचित, मौलिक व अप्रकाशित आलेख


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