संस्कारों को समझें युवा
इलमा अज़ीम
व्यक्ति के जीवन में संस्कारों का बड़ा महत्व होता है। जितने भी महापुरुष हुए हैं वे संस्कारों की सीढ़ी पर चढ़कर ही जीवन के हर क्षेत्र में सफल हुए हैं। संस्कारों से ही संस्कृति की रक्षा होती है। पाश्चात्य संस्कृति के अंधानुकरण एवं वर्तमान भौतिक चकाचौंध में वहकर युवा पीढ़ी संस्कार को भूलकर पतन की ओर अग्रसर हो रही है।
युवा पीढ़ी को ही पतन के लिए दोषी नहीं ठहरा सकते, कुसंस्कार के लिए हम भी दोषी हैं। बालक को गर्भावस्था में मां से संस्कार मिलते हैं। महान योद्धा अभिमन्यु को चक्रव्यूह में प्रवेश की शिक्षा अपनी माता से गर्भमें मिली थी। संस्कारों से चरित्र का निर्माण होता है। जिसका चरित्र उज्जवल होता है उसकी पूजा होती है। संस्कारों को वृति कहते हैं, वृति से ही हमारी प्रवृत्ति बनती है। आज से लगभग 50 वर्ष पहले चलकर हम देखें तो बालक को जन्म के साथ ही माता-पिता अच्छे संस्कार प्रदान कर सफल जीवन की ओर बढ़ाते थे।
बालक बालिकाओं की सह शिक्षा का निषेध था। बालक बालिकाओं की दैनिक गतिविधियों पर परिवार की पैनी नजर रहती थी। वर्तमान में युवा पीढ़ी में जो संस्कारहीनता आई है। प्रेम विवाह, अंतर्जातीय विवाह, नशे की बढ़ती प्रवृत्ति, प्रत्येक शनिवार को क्लवों में युवक युवतियों की नाईट आउट पार्टियां, गर्भपात, भ्रूण हत्या, विवाह पूर्व फिल्मांकन, मोबाइल की गंदी आदत से आत्महत्या करना, हुक्का पब क्लवों में नशाखोरी, बिना विवाह किये लिव इन रिलेशनशिप में रहना, माता-पिता को वृद्धाश्रम में रहने की मजबूरी, अनैतिक तरीके से धन उपार्जन करना। आदि अनेक गलत आदतें युवा पीढ़ी में बढ़ रही है। इसके प्रति परिवार के साथ समाजसेवियों को भी जागरूक होना पड़ेगा।





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