आधुनिक जीवन दृष्टि में बदलाव की जरूरत



- प्रो. नंदलाल
भारतीय समाज प्रारंभ से ही सहिष्णु रहा है। सहिष्णुता भारतीय संस्कृति के हर तार से झंकृत होता है पर भारतीय जन मानस में सूचना क्रांति के बाद अचानक चिंतन के स्तर पर बदलाव महसूस किया जा रहा है। सन दो हजार के पूर्व तक यह चाल मध्यम स्तर की थी पर इसके बाद तो मानो इसमें पंख लग गये हों, यह मात्र तेज ही नहीं अपितु उड़ान भरने लगा है। इस उड़ान में न जाने क्या क्या उड़ गया अधिकांश लोगों को इसकी चेतना तक नहीं है।वे उड़ते जा रहे हैं,बस उड़ते और आनंदित हो रहे हैं मानो उन्हें जीवन का मार्ग मिल गया  हो और वे जिये जा रहे हैं। अब उस जीवन को समझना जरूरी है जो वे जी रहे हैं और वर्तमान में आगे जा रहे हैं।अधिकांश लोग कुछ न कुछ हुनर सीखना चाहते हैं और उस हुनर के सहारे अपनी आजीविका को आगे बढ़ाना चाह रहे हैं। वे उसमें सफल भी हो रहे हैं। यदि यह कहें कि उनमें वैज्ञानिक झुकाव आ रहा है तो यह गलत नहीं है। लोग विज्ञान और तकनीकी को अपने आजीविका का साधन मानने लगे हैं।
        आजीविका और उदर भरण व्यक्ति की मौलिक या मूल भूत आवश्यकता होती है। यह आप और हम सभी जानते हैं।जिसमें रोटी, कपड़ा और मकान आता है। अधिकांश भारतीय जनमानस अपनी इन मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने में जी जान से जुटने का प्रयास कर रहा है। अर्थात बढ़ती जनसंख्या और उनकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति में समाज लगा हुआ है। लेकिन एक बात साथ साथ और चल रही है कि आजकल के लोगों में आक्रामकता और चेहरे पर तनाव सामान्यतः आपको दिख जाएगा जो पहले भारत के समाज में नहीं था। क्या आजीविका की खोज में यह स्थिति उत्पन्न हो रही है या मूलभूत जरूरतों के पूरा होने के बाद की स्थिति है जिससे तनाव व आक्रामकता में वृद्धि हुई है और लोग झगड़ा, आत्महत्या, लूट, खसोट, भ्रष्टाचार, शोषण, उत्पीड़न हिंसा, मारपीट, बलात्कार, यौन शोषण, व्यभिचार, आपसी मनमुटाव, गोलबंदी, स्वार्थ, लोभ, मोह इत्यादि में अधिक रुचि ले रहे हैं। इस प्रश्न पर गंभीरता से विचार करने की जरूरत है अन्यथा भारतीय समाज असहिष्णु की तरफ अग्रसर हो सकता है। जो कहीं कहीं समाज में प्रत्यक्ष हो रहा है।
आवश्यकताओं की फेहरिस्त को जब मनोवैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय दृष्टिकोण से खंगाला जाता है तो पाते हैं कि प्रथम पायदान पर शारीरिक आवश्यकताएं ही आती हैं जिनमें रोटी कपड़ा और मकान आता है। दूसरे पायदान पर सुरक्षा की जरूरत होती है। भगवान कृष्ण गीता में कहते हैं कि
    अन्यायश्चिंतयांतो माम ये जना पर्यु पासते
     तेशाम नित्य अभियुक्तनाम् योग क्षेमम वहाम्याहम।
   जो भक्त नित्य मेरा ध्यान करते हैं और मुझे ही सोचते रहते हैं,मेरी उपासना में तल्लीन रहते हैं मै अपने उन भक्तों को अप्राप्त वस्तुओं की प्राप्ति कराता हूं और सिर्फ प्राप्त ही नहीं कराता अपितु उसकी रक्षा भी करता हूं। तो जो चीज प्राप्त हो जाती है उसकी सुरक्षा करना भी एक बड़ी जिम्मेदारी होती है। इसलिए आवश्यकताओं की सूची में सुरक्षा को दूसरे नंबर पर रखा गया है।तीसरे नंबर पर प्यार मोहब्बत, भाई चारा, आपसी सामंजस्य आता है, चौथे नंबर पर आत्म सम्मान और पांचवे नंबर पर आत्म अनुभूति या आत्म स्वीकारोक्ति आता है।
      अब इस क्रम की विवेचना करें तो पायेंगे और देखेंगे कि भारतीय समाज किस स्थिति में है। क्या वह अपने रोजी रोटी के जुगाड़ में अटका है या मूलभूत आवश्यकताओं को पूरा करने में लगा है तो यह तो प्रथम पायदान ही है। तो क्या हम अभी प्रथम आवश्यकता की पूर्ति ठीक ढंग से नहीं कर पा रहे हैं। फिर हम सुरक्षा के बारे में कैसे सोच सकते हैं।
     यदि पुरुषार्थ चतुष्टय की दृष्टि से विवेचना करें तो धर्म अर्थ काम और मोक्ष की संकल्पना आती है। तो धर्म के दृष्टि से देखें तो लोग धर्म और और अर्थ दोनों को साधना तो चाहते हैं पर धर्म को वास्तविक धरातल से दूर दिखावे के रूप में अधिक लिया जा रहा है। जबसे धर्म को राजनीति से जोड़ दिया गया तबसे धर्म का प्रयोग राजनैतिक स्वार्थ की पूर्ति का साधन बन चुका है। और धर्म के नाम पर दिखावा अधिक उपासना कम हो गई है। इस जरूरत को समाज लांघकर दूसरे अर्थात अर्थ और काम की पूर्ति में लग गया है।जब धर्म दिखावा का साधन हो गया हो तो अर्थ और काम का रास्ता भी बिगड़ जाता है। इसलिए समाज धन की व्यवस्था और उपभोग की मनोदशा में लिप्त हो गया है और उसकी मनोदशा आक्रामकता और आक्रोश की तरफ मुड़ गई है।
    इसलिए भारतीय जीवन दृष्टि पर गंभीरता से विचार करना आवश्यक हो गया है। भारत अपनी संस्कृति और ज्ञान की पराकाष्ठा के लिए जाना जाता था। भारतीय चिंतन उच्च कोटि का था और उनका रहन सहन दुनिया को आकृष्ट करता था। विश्वबन्धुत्व, संगछध्वं, संबद्धवं इसका मौलिक दर्शन था।पर अब हम अब पाश्चात्य दर्शन को अपना मॉडल मानने लगे हैं।लोग विदेशों में बस रहे हैं। विदेश में बसने वालों की संख्या में दिन दूना रात चौगुना वृद्धि हो रही है। इसी को लोग अपने जीवन का मानक मानने लगे हैं जिससे वे अपने हैसियत का प्रदर्शन कर रहे हैं।
भारतीय जीवन दर्शन हर तरह से मोक्षदाई रहा है। यही आत्मानुभूति का साधन है जिससे मानव जन्म अपने को धन्य मानता है। विचार करना और चिंतन जरूरी हो गया है।
(शोध विवेचक, चित्रकूट)

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