समझौते के सवाल


  राजीव त्यागी 

भारत और अमेरिका के बीच हुए नए व्यापार करार को सरकार बड़ी उपलब्धि बता रही है। मंत्री बयान दे रहे हैं और इसे देश के लिए फायदेमंद बताया जा रहा है, लेकिन इस करार को लेकर कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। क्या वाकई यह समझौता भारत के किसानों और आम लोगों के हित में है, या फिर नुकसान को जीत बताने की कोशिश की जा रही है? इस समझौते से जुड़ी आशंकाओं को लेकर कुछ किसान संगठन आगामी 12 फरवरी को देशव्यापी विरोध प्रदर्शन की तैयारी कर रहे हैं। 

निस्संदेह, उनकी आशंकाएं सिर्फ सोयाबीन तेल, सूखे अनाज और सेब पर आयात शुल्क में छूट को लेकर ही नहीं हैं, बल्कि विश्वास, पारदर्शिता और भारतीय कृषि के भविष्य को लेकर भी हैं। वहीं दूसरी ओर सरकार दावा कर रही है कि किसान हितों की रक्षा के लिये पर्याप्त सुरक्षा उपाय किए गए हैं। देखा जाए तो कागजों पर तो ये आश्वासन राहत देने वाले लगते हैं, लेकिन व्यवहार में किसानों की आशंकाओं से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता। भारी सब्सिडी प्राप्त अमेरिकी सेब से हिमाचल, जम्मू-कश्मीर और उत्तराखंड के सेब उत्पादकों के लिए मुकाबला करना चुनौतीपूर्ण होगा।

 हिमाचल के सेब उत्पादक संगठनों का कहना है कि अमेरिकी सेब पर आयात शुल्क पचास से 25 प्रतिशत करना व न्यूनतम आयात मूल्य 50 से बढ़ाकर 80 रुपये प्रति किलोग्राम करने से यह स्वदेशी प्रीमियम सेवा के दाम पर बाजार में बिकने लगेगा। जिसके चलते भारतीय उपभोक्ता समान मूल्य पर उच्च गुणवत्ता वाले अमेरिकी सेब को तरजीह देंगे। साथ ही सेब का कोल्ड स्टोरेज में संग्रह करना अलाभकारी हो जाएगा। उधर, केंद्र सरकार का दावा है कि कृषि और दुग्ध उद्योग संरक्षित रहेंगे। जबकि संयुक्त समझौते में कृषि और खाद्य उत्पादों की एक विस्तृत शृंखला पर शुल्क कम करने और गैर-शुल्क बाधाओं को दूर करने की बात कही गई है।

 कम आय, बढ़ती लागत और बढ़ते कर्ज से जूझ रहे किसानों को इन गंभीर मुद्दों पर स्पष्टता चाहिए। यही वजह है कि कई किसान संगठनों, विपक्षी दलों और कुछ राज्य सरकारों ने मांग की है कि इस समझौते का पूरा विवरण संसद के समक्ष रखा जाए। उनकी यह मांग तार्किक है क्योंकि व्यापार समझौते भी घरेलू कानूनों की तरह ही आजीविका को गहराई तक प्रभावित करते हैं। कृषि विशेषज्ञ मान रहे हैं कि मजबूत घरेलू समर्थन, उचित मूल्य, सब्सिडी, बुनियादी ढांचे और जोखिम संरक्षण दिए बिना, बाजारों को खोलने के कदम छोटे और सीमांत किसानों पर भारी पड़ सकते हैं। इसी फिक्र के चलते हड़ताल एक चेतावनी है।

 यदि सरकार का मानना है कि यह समझौता वास्तव में किसानों के हितों को प्राथमिकता देता है तो उसे पारदर्शिता, संसदीय बहस और सार्थक परामर्श के माध्यम से इसे साबित भी करना चाहिए। अन्यथा, सुधारों की कहानी एक बार फिर देश के अन्नदाता की चिंताओं को दूर करने में विफल रहेगी। 

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