राजीव त्यागी
बच्चे वही सीखते हैं जो वे अपने घर में देखते हैं। यदि घर में बुजुर्गों का सम्मान होता है, संवाद की संस्कृति होती है और दूसरों के प्रति संवेदनशीलता दिखाई जाती है, तो वही संस्कार बच्चों में स्वत: उतरते हैं। यदि बच्चा पढ़ाई या किसी विशेष विषय में अपेक्षित सफलता नहीं पा रहा है, तो घबराने या उसे दोष देने की बजाय धैर्य रखना चाहिए। हर बच्चा अलग होता है, उसकी क्षमता और गति भी अलग होती है।
ऐसे समय में माता-पिता का साथ, प्रोत्साहन और विश्वास ही बच्चे का सबसे बड़ा सहारा बनता है। ‘तुम कर सकते हो’ का भाव, यानी ‘कैन डू’ की भावना, बच्चों के भीतर आत्मविश्वास का बीज बोती है। मां बाप को चाहिए कि वे अपने बच्चों को संघर्ष करना, समस्याओं का सामना करना सिखाएं। बड़े-बुजुर्गों का आदर करना भारतीय संस्कृति की आत्मा है। यह संस्कार यदि बचपन में बच्चों को मिल जाए, तो आगे चलकर यही उनके चरित्र की पहचान बनता है। साथ ही बच्चों के साथ समय बिताना, उनसे खुलकर बात करना, उन्हें धर्मस्थलों और सांस्कृतिक स्थलों से जोडऩा भी उनके नैतिक विकास में सहायक होता है।
आज हर माता-पिता यह चाहते हैं कि उनके बच्चे ऊंचे पदों पर पहुंचें, सम्मानजनक जीवन जिएं और आर्थिक रूप से सशक्त बनें। इसके लिए माता-पिता को भी त्याग करना पड़ता है, अपने समय, अपने आराम और कई बार अपनी इच्छाओं का। बच्चों की स्कूल-प्रगति पर नजर रखना, शिक्षकों से संवाद बनाए रखना और बच्चों के व्यवहार में आने वाले बदलावों को समय रहते समझना अत्यंत आवश्यक है।
यह भी हमें याद रखना चाहिए कि शिक्षा का अंतिम उद्देश्य केवल डिग्री प्राप्त करना नहीं, बल्कि हुनरमंद बनना है। आज सरकार भी कौशल विकास और व्यावसायिक प्रशिक्षण पर विशेष जोर दे रही है, ताकि बच्चे स्वरोजगार और आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ सकें। बढ़ती प्रतिस्पर्धा के इस युग में वही बच्चे आगे बढ़ेंगे, जो अपनी रुचि और क्षमता के अनुसार सीखेंगे और निरंतर स्वयं को निखारते रहेंगे। अंतत:, बच्चों की रुचि को पहचानना और उसी दिशा में उन्हें प्रोत्साहित करना माता-पिता का सबसे बड़ा योगदान हो सकता है। जब बच्चे अपने भीतर विश्वास, संस्कार और कौशल लेकर आगे बढ़ते हैं, तभी वे न केवल अपना, बल्कि अपने माता-पिता और समाज का भविष्य भी उज्ज्वल बनाते हैं।






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