सोशल मीडिया का दुरुपयोग
इलमा अज़ीम
यह सत्य है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एवं इंटरनेट ने सूचना के प्रसार एवं लोकतांत्रिकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन आज यह बच्चों एवं युवा वर्ग का ध्यान भटकाने का मुख्य कारक बन गया है। गलत सूचना के दुष्प्रचार के लिए यह प्लेटफार्म एक शक्तिशाली हथियार बन चुके हैं।
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जरूरत से ज्यादा सक्रिय रहने के कारण आज युवाओं में चिंता, धैर्य की कमी, आत्महत्या, अकेलापन, अपनी भावनाओं को व्यक्त न करना, सामाजिक मेल जोल न रखना, चिड़चिड़ापन, नशे की प्रवृत्ति का बढऩा, वास्तविकता से दूर रहना, दिखावा करना आदि लक्षण सामने आ रहे हैं।
आज के समय में सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर जाति, धर्म और वर्ग से संबंधित व्हाट्सएप ग्रुप बने हुए हैं, जो बहुत ही गहराई और चुपचाप तरीके से अलगाव, धु्रवीकरण, जातिवाद, आतंकवाद और धार्मिक कट्टरता को बढ़ावा दे रहा है। देश में चुनावी प्रक्रिया के दौरान सोशल मीडिया के माध्यम से फैलाई जा रही भ्रामक जानकारी गलत सूचनाएं, और भ्रामक प्रचार स्वस्थ लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए एक बड़ी चुनौती और अभिशाप के रूप में उभर रहे हैं।
आज के दौर में बच्चे व युवा वास्तविक दुनिया व रील दुनिया के बीच में अंतर स्पष्ट नहीं कर पा रहे हैं। जिससे कि आज बच्चे वास्तविकता से दूर जा रहे हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि माता-पिता की निगरानी, डिजिटल डिटॉक्स, और स्कूलों में डिजिटल साक्षरता कार्यक्रमों के माध्यम से इस बढ़ते मानसिक स्वास्थ्य संकट का गंभीरता से समाधान किया जाना चाहिए।
आज ग्रामीण परिवेश में रह रहे युवा और स्त्रियां भी घटिया और अश्लील रील बना रहे हैं जिससे परिवार और समाज का सामाजिक एवं नैतिक पतन हो रहा है। सोशल मीडिया पर पूर्ण पाबंदी के बजाय भ्रामक सामग्री, साइबर बुलिंग और मानसिक स्वास्थ्य पर पडऩे वाले नकारात्मक प्रभावों को रोकने के लिए, विशेषकर बच्चों और युवाओं के लिए, इसके इस्तेमाल पर उम्र का प्रतिबंध लगाना अधिक जरूरी हो गया है। अभिभावकों को चाहिए कि वे कभी भी अपने बच्चों को खाना खिलाते समय मोबाइल फोन का इस्तेमाल न करने दे, नहीं तो वे आने वाली पीढ़ी को एक बहुत बड़े खतरे में डाल रहे हैं।





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