ट्रम्प : संप्रभुता की कीमत पर प्रभुत्व


- प्रो. आरके जैन “अरिजीत”

ट्रम्प प्रशासन की विदेश नीति अब पारंपरिक कूटनीति की सीमाओं को पार कर चुकी है। यह अब केवल दबाव, संवाद या प्रतीकात्मक चेतावनियों तक सीमित नहीं है। शक्ति का खुला प्रदर्शन, प्रत्यक्ष धमकियाँ और सैन्य हस्तक्षेप को अब वैध विदेश नीति के साधन के रूप में स्वीकार किया जा रहा है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद बनी नियम-आधारित वैश्विक व्यवस्था, जो संप्रभुता, अंतरराष्ट्रीय कानून और बहुपक्षीय सहयोग पर टिकी थी, आज गंभीर संकट में है। “अमेरिका फर्स्ट” का नारा व्यवहार में “अमेरिका एवरीवेयर” बन चुका है। सैन्य शक्ति और आर्थिक प्रतिबंधों को नैतिक जिम्मेदारी या राष्ट्रीय सुरक्षा की भाषा में प्रस्तुत किया जा रहा है। इस बदलाव ने वैश्विक राजनीति को नया रूप दिया है।

जनवरी 2026 की घटनाओं ने इस नई कूटनीति को पूरी स्पष्टता से उजागर किया है। कूटनीति अब संवाद का माध्यम कम और नियंत्रण व दमन का औजार अधिक बन गई है। ट्रम्प प्रशासन की धारणा है कि वैश्विक संस्थाएँ और सहमति तभी उपयोगी हैं, जब वे अमेरिकी हितों से पूरी तरह मेल खाती हों। यदि ऐसा नहीं होता, तो एकतरफा कार्रवाई को अंतिम और उचित विकल्प माना जाता है। इस प्रवृत्ति ने विश्व में अस्थिरता को बढ़ावा दिया है। छोटे और मध्यम देशों के लिए भविष्य और अधिक अनिश्चित हो गया है। नियमों का स्थान शक्ति ने ले लिया है। सहयोग की जगह प्रतिस्पर्धा और दबाव हावी हो रहा है।



वेनेजुएला में अमेरिकी विशेष बलों की कार्रवाई इस आक्रामक कूटनीति का सबसे स्पष्ट उदाहरण है। 3 जनवरी 2026 को कराकास में सैन्य छापेमारी हुई। राष्ट्रपति निकोलस मदुरो और उनकी पत्नी को गिरफ्तार कर न्यूयॉर्क ले जाया गया। ट्रम्प ने इसे “सर्जिकल स्ट्राइक” या “कानून प्रवर्तन अभियान” कहा। लेकिन यह एक संप्रभु राष्ट्र की राजनीतिक व्यवस्था पर सीधा हमला था। मदुरो को ड्रग तस्करी के आरोप में अदालत में पेश किया गया। इस कार्रवाई के पीछे तेल संसाधनों पर नियंत्रण और क्षेत्रीय प्रभुत्व की रणनीति स्पष्ट दिखती है। चीन, रूस और ईरान को वहाँ से बाहर करने की मंशा भी है।

इस हस्तक्षेप के बाद अमेरिका ने वेनेजुएला में “संक्रमण काल” को नियंत्रित करने की घोषणा की। संयुक्त राष्ट्र और कई देशों ने इसे अवैध बताया। रूस और चीन ने इसे आक्रामकता का प्रमाण कहा। लैटिन अमेरिकी देशों ने इसे मोनरो सिद्धांत के नए और खतरनाक संस्करण के रूप में देखा। ट्रम्प प्रशासन ने इसे “मानवीय दायित्व” और “नशीले पदार्थों के खिलाफ युद्ध” बताया। लेकिन आलोचक इसे संसाधनों और प्रभाव क्षेत्र की होड़ मानते हैं। अंतरराष्ट्रीय कानून की सीमाएँ धुंधली हो गई हैं। संप्रभुता का सिद्धांत गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है।

ईरान के संदर्भ में ट्रम्प प्रशासन की भाषा और भी उग्र व विस्फोटक रही है। जनवरी 2026 में ईरान में आर्थिक संकट के कारण बड़े विरोध प्रदर्शन हुए। ट्रम्प ने चेतावनी दी कि यदि प्रदर्शनकारियों पर हिंसा हुई तो अमेरिका हस्तक्षेप करेगा। “लॉकड एंड लोडेड” और “हेल्प इज ऑन द वे” जैसे बयान दिए गए। यह मात्र बयानबाजी नहीं थी। यह संभावित सैन्य हस्तक्षेप का स्पष्ट संकेत था। इससे मध्य पूर्व में तनाव चरम पर पहुँचा। होर्मुज जलडमरूमध्य में ऊर्जा आपूर्ति पर खतरा मंडराने लगा। वैश्विक व्यापार प्रभावित होने की आशंका बढ़ गई।

ईरान नीति में वेनेजुएला मॉडल की छाया साफ दिखती है। आंतरिक असंतोष को बाहरी हस्तक्षेप का आधार बनाया जा रहा है। विशेषज्ञ मानते हैं कि ऐसी धमकियाँ अल्पकाल में दबाव तो बनाती हैं। लेकिन दीर्घकाल में नेतृत्व को और कठोर व राष्ट्रवादी बनाती हैं। आंतरिक समर्थन बढ़ता है। रूस और चीन इसे पश्चिमी दोहरे मानदंडों का उदाहरण बताते हैं। इससे उनका वैश्विक प्रभाव बढ़ रहा है। अमेरिकी रणनीति उलटी पड़ सकती है। क्षेत्रीय स्थिरता पर गहरा असर पड़ रहा है।

ग्रीनलैंड को लेकर ट्रम्प की महत्वाकांक्षा इस कूटनीति का सबसे असामान्य लेकिन खतरनाक पहलू है। ट्रम्प ने कहा कि ग्रीनलैंड को “एक या दूसरे तरीके से” अमेरिका के अधीन होना चाहिए। इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और आर्कटिक रणनीति से जोड़ा गया। लेकिन वास्तव में यह संसाधनों और भू-राजनीतिक वर्चस्व की प्रतिस्पर्धा है। डेनमार्क और ग्रीनलैंड ने इसे स्पष्ट रूप से खारिज किया। इसे संप्रभुता पर सीधा आघात बताया गया। यूरोप में गहरी चिंता फैली। “सभी विकल्प खुले” जैसे बयानों ने सैन्य कार्रवाई की आशंका बढ़ा दी।  

ग्रीनलैंड प्रकरण ने नाटो के भीतर मौजूद मतभेदों को उजागर कर दिया है। अमेरिका इसे आर्कटिक में रूस और चीन के प्रभाव को रोकने के लिए आवश्यक बताता है। यूरोपीय सहयोगी इसे अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन मानते हैं। जलवायु परिवर्तन से पिघलती बर्फ नए समुद्री मार्ग खोल रही है। संसाधनों की उपलब्धता बढ़ रही है। लेकिन सहयोग के बजाय शक्ति प्रदर्शन की प्रतिस्पर्धा तेज होती जा रही है। भविष्य के टकरावों की भूमिका बन रही है। वैश्विक संतुलन खतरे में पड़ता दिख रहा है।



वेनेजुएला, ईरान और ग्रीनलैंड—इन तीनों मोर्चों पर ट्रम्प प्रशासन की नीति एक साझा पैटर्न सामने लाती है। नियम-आधारित व्यवस्था के स्थान पर शक्ति-आधारित निर्णय लिए जा रहे हैं। कूटनीति अब संवाद का नहीं, बल्कि धमकी और दमन का माध्यम बन गई है। अल्पकाल में अमेरिका सशक्त दिखाई दे सकता है। लेकिन दीर्घकाल में सहयोगियों का भरोसा कमजोर पड़ रहा है। वैश्विक व्यवस्था दरक रही है। दुनिया एक निर्णायक मोड़ पर खड़ी है। भविष्य शक्ति के शासन से चलेगा या कानून और सहयोग के सिद्धांतों से—यह प्रश्न अब एक व्यावहारिक चुनौती बन चुका है।

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