संस्कृति का मर्म
 इलमा अज़ीम 
संस्कृति सुसंस्कारों से सिंचित करती है। ऋतु-परिवर्तन, तीज-त्योहार, अतिथि-सत्कार आदि हमारी संस्कृति की विशेषताएं रही हैं। धीरे-धीरे हम अपनी संस्कृति से दूर होते चले गए, जिसके परिणाम-स्वरूप जीवन-मूल्यों का निरंतर पतन होता गया। रिश्तों में सेंध लग गई तथा अविश्वास के कारण रिश्तों में खटास उत्पन्न हो गई। चारवाक दर्शन के ‘खाओ-पीओ और मौज उड़ाओ’ का प्रभाव हम पर हावी हो गया। 

मर्यादा न जाने कहांं मुंह छुपाकर बैठ गई। बुज़ुर्ग, माता-पिता व गुरुजन हाशिये पर चले गए। शराब, सिगरेट व रेव पार्टियों का प्रचलन बढ़ गया। संबंध हैलो-हाय तक सिमट गए। सुप्रीम कोर्ट द्वारा लिव-इन को मान्यता देना विचलित करता है। परंतु अब लिव-इन के लिए माता-पिता की अनुमति को आवश्यक स्वीकारा गया है। 



दूसरी ओर विदेशों में लोग हमारी संस्कृति अपना रहे हैं। वे योग, ध्यान की ओर आकर्षित हो रहे हैं। वेदों का महत्व वे स्वीकारने लगे हैं। दया, करुणा, ममता व संबंधों की स्वीकार्यता का भाव पनप रहा है तथा हिन्दू धर्म में उनकी श्रद्धा-आस्था बढ़ रही है।


हम सभी धर्मों में आस्था रखते हैं। हम में प्रेम व समर्पण की भावना कूट-कूट कर भरी है। रामचरितमानस में राम, लक्ष्मण, सीता, उर्मिला, भरत, शत्रुघ्न आदि सभी पात्रों का त्याग स्तुत्य है। दधीचि का अपनी हड्डियां दान देना श्लाघनीय है। भगवत‍‍् गीता को मैनेजमेंट गुरु के रूप में विभिन्न देशों में पढ़ाया जाना उसकी उपयोगिता सिद्ध करता है। इसलिए भारत विश्व गुरु कहलाता था। काश! हम अपनी संस्कृति के उदार दृष्टिकोण को स्वीकार पाते। यही जीवन की सार्थकता है, जो हमें विभिन्न देशों की संस्कृति से उत्तम सिद्ध करती है।

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