दमन से बढ़ेगा असंतोष

 इलमा अज़ीम 
 
मौजूदा लोकतांत्रिक विश्व में सत्ता द्वारा संवाद के बजाय शक्ति पर निर्भरता, उसकी उस वैधता को ही कमजोर करती है, जिसे वह अपने हित में संरक्षित करना चाहती है। शासन द्वारा जनता की आवाजों को दबाने का उपक्रम अस्थायी शांति तो ला सकता है, लेकिन शासन के प्रति अविश्वास को बढ़ाता है और अलगाव की खाई को गहरा करता है। ईरान सरकार की दमनकारी नीतियों से वैश्विक समुदाय असहज महसूस कर रहा है। 
हालांकि, ईरान लंबे समय से पश्चिमी देशों खासकर अमेरिका के दुराग्रहों का शिकार रहा है। ईरान की परमाणु नीति के चलते उस पर व्यापक प्रतिबंध भी लगाए गए हैं, जिससे धीरे-धीरे ईरान की आर्थिक स्थिति बदतर होती चली गई। फलस्वरूप महंगाई की मार से त्रस्त जनता सड़कों पर उतर आई। लेकिन एक हकीकत यह भी है कि प्रतिबंधों और राजनयिक अलगाव से स्थितियों में कोई सार्थक सुधार नहीं हुआ है। लेकिन आम लोगों की जिंदगी ज्यादा कष्टकारी हो चली है। तेहरान के साथ भारत के कूटनीतिक व आर्थिक संबंध बेहतर रहे हैं, मौजूदा स्थिति में भारत को ईरान के साथ सावधानी के साथ संतुलित संबंध बनाये रखने होंगे। ईरान के विदेश मंत्री की प्रस्तावित भारत यात्रा के दौरान बातचीत में इस नाजुक संतुलन की परीक्षा होगी।


 जिसे ईरान के आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को मजबूत करने के प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। ईरान में दशकों से जारी कट्टरपंथी शासन में गाहे-बगाहे प्रतिरोध के स्वर उभरते रहे हैं, जिनका दमन भी शक्ति से होता रहा है। लेकिन मौजूदा विरोध पिछले एक दशक में सबसे तीव्र है। प्रदर्शनकारियों के दमन और प्रदर्शनकारियों को मृत्यु दंड देने की चेतावनी के बाद नहीं लगता है कि जन-अशांति कम होगी। प्रदर्शनकारियों को ‘ईश्वर का शत्रु’ बताने की ढाल ईरानी सत्ताधीशों को किस हद तक सुरक्षा कवच मुहैया कराएगी, कहना कठिन है।
 ये महज तात्कालिक उद्देश्य ही किसी हद तक पूरा कर सकता है। इतिहास गवाह है कि दमन से व्यापक असहमति को शायद ही कभी दबाया जा सका हो। जब भी सत्ताधीशों ने ताकत के बल पर जनभावनाओं का दमन किया, फौरी तौर पर भले ही वह दबता दिखता हो, लेकिन वास्तविकता ठीक इसके विपरीत होती है। भीतर-ही-भीतर आक्रोश सुलगता रहता है। 


कालांतर वह अधिक वेग से वापस लौटकर सत्ता में बदलाव लाता है। दुनिया में तमाम उदाहरण विभिन्न देशों में सामने आते हैं। वास्तव में ईरान का संकट एक एकीकृत धर्म आधारित सत्ता और खुलेपन की ओर बढ़ते समाज का टकराव है। विशेष रूप से सत्ता और युवा वर्ग के बीच खाई लगातार चौड़ी हुई है। 

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