चला गया बंद रोड का खुला आदमी भी'


- डॉ. अवनीश यादव
तीसरे सप्तक के महत्वपूर्ण कवि केदारनाथ सिंह की एक कविता है 'जाना' शीर्षक से, जिसमें कवि स्वीकार करता है कि 'जाना हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है।' यूं तो 'जाना' कई प्रसंगों में हो सकता है ! पर इसका पीड़ादायक संस्करण और इसमें निहित वेदना तब ज्यादा स्पष्ट होती है जब कोई अपना या अपना साहित्यिक पुरखा चला जाता है हमसे दूर - कुछ घंटे, दिन, मास तथा वर्ष से परे सदैव के लिए। इस फ़ानी दुनिया को अलविदा बोलकर।
यह जानते हुए भी कि इस फ़ानी दुनिया में शाश्वत कुछ भी नहीं है, फिर भी जाना तकलीफदेह होता, चेतना को झिंझोड़ता है, क्योंकि यह हिंदी की सबसे खौफनाक क्रिया है, जो सीधे हृदय पर चोट करती है। हिंदी जगत कवि विनोद कुमार शुक्ल, कहानीकार व 'पहल' के संपादक ज्ञानरंजन, कवि नासिर अहमद सिकंदर के जाने के गम को अभी भुला भी नहीं पाया था कि 16 जनवरी, 2026 को कवि, आलोचक राजेंद्र कुमार, आलोचक वीरेंद्र यादव भी का अचानक अलविदा कह जाना साहित्य जगत को और ग़मगीन कर गया।
मानवीय सभ्यता के व्यापक धरातलीय फलक पर कुछ ऐसे व्यक्ति भी रहे जिन्हें न अधिकता की चाह रही और न ही न्यूनता की परवाह। वो तो बस एक जीवन जीते रहे। एक ऐसा जीवन जिसे किसी दराज़ में बंद नहीं किया जा सकता। आंतरिक आयाम इतना व्यापक एवं विस्तृत रहा कि जिसके क्षेत्रफल का आंकलन किसी गुनिया और ज़रीब के मार्फत नहीं किया जा सकता था। कुछ ऐसी ही मिट्टी से निर्मित थे कवि, आलोचक राजेंद्र कुमार। जिनकी दृष्टि की पक्षधरता सोना, चांदी में नहीं, अपितु लोहा-लक्कड़ में थी।
तो लोहा लक्कड़ के इस फक्कड़ (राजेंद्र कुमार) का जन्म 24 जुलाई,1943 को कानपुर में हुआ था। वही कानपुर जहां कल -कारखाने थे/हैं और मिल मजदूरों का संघर्ष था। इलाहाबाद में पढ़ा, पढ़ाया, इलाहाबाद विश्विद्यालय के हिंदी विभाग के चर्चित प्रोफ़ेसर हुए, अध्यक्ष हुए, कवि, आलोचक के रूप में प्रदेश, देश में भरपूर जाने- पहचाने गए। और यहीं के होकर कमला नेहरू अस्पताल के आईसीयू वार्ड में 16 जनवरी,2026 लगभग 2.20 रात्रि को अलविदा कह गए।
उनका मन- मिजाज़ देखिए, जीते जी ज्ञान देते ही रहे। मृत्यु के उपरांत भी देहदान कर गए मेडिकल कॉलेज के एनाटोमी विभाग को। यानी इस दुनिया को अलविदा कहने के बाद भी ज्ञान के लिए अपना पार्थिव शरीर विज्ञान के हवाले कर गए। ऐसे थे राजेंद्र कुमार बिलकुल खुले वैज्ञानिक विचार के, सादगी, सहजता, सहृदयता इनके व्यक्तित्व के गाढ़े रसायन थे।
उनके जीवन का एक और पक्ष जिसका अक्स उनके काव्यात्मक रचाव में पैबस्त है- 'मेरा पता'। वैसे तो कवि राजेंद्र कुमार का आवास इलाहाबाद के बंद रोड पर है,(इलाहाबाद विश्विद्यालय के सेंट्रल लाइब्रेरी गेट के ठीक सामने रास्ते पर) पर वे मन - मिज़ाज से बेहद खुले व्यक्ति थे, जिससे भी मिलते थे ईर्ष्या- द्वेष से परे पूरी तरह खुले हृदय और मन से, जिस विषय पर भी बात करते थे पूरी तरह खुलकर, अर्थ की अपार सार्थक संभावना के साथ। वाकई कवि राजेंद्र कुमार बंद रोड के खुले आदमी थे।
रचना और आलोचना दोनों में प्रभावशाली रूप से सक्रिय रहने वाले 'समय सजग और सहज आत्मीयता' के कवि,आलोचक राजेन्द्र कुमार एक ऐसे ही व्यक्ति थे।
कवि राजेंद्र कुमार की रचनाशीलता 70 के दशक से अब तक विविध विधाओं में सतत् प्रवाहित रही। अब तक वे कुल चार काव्य संग्रह - ऋण गुणा ऋण, हर कोशिश है एक बगावत, लोहा-लक्कड़ और उदासी का ध्रुपद अपने नाम दर्ज करा चुके हैं।
जीवन और साहित्य सृजन में विज्ञानवादी दृष्टि के पक्षधर राजेंद्र कुमार की कविताएँ तीर्थस्थलों पर लगने वाले भव्य कुंभ की भव्यता का आख्यान नहीं हैं। इन कविताओं में लोक के लोगों का सीधा ईश्वर से साक्षात्कार कराने वाले वैभव विलास में आकंठ डूबे, ईश्वर के दूत बने, धर्म के ठेकेदारों का वास्तविक चेहरा है, जो मानव जीवन को सफल बनाने के नुस्खे हर पंडाल में लिए बैठे हैं।


कवि राजेन्द्र कुमार की कविताओं का संवेदनात्मक विस्तार वक्त के यथार्थ से गहरे तक जुड़ा हुआ है। आज कवि काया से भले हमारे बीच नहीं है पर कविता, आलोचना और दिए ज्ञान के बूते अपने पाठकों के जेहन में लंबे समय तक बना रहेगा। राजेंद्र कुमार के जाने से एक बड़ी रिक्त साहित्य, समाज में हुई है, उनका जाना पाठकों /शुभचिंतकों को बेचैन कर गया पर इनका लेखन बेगाने होने से बचा लिया।

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