सिमटते रिश्ते
कवल जीत सिंह 
भाग-दौड़़ की आज की डिजिटल जिंदगी में मानवीय रिश्ते सिमटते जा रहे हैं। यह सिमटन केवल दूरियों तक सीमित नहीं, बल्कि भावनाओं और कर्तव्यों के स्तर पर भी घट रही है। समाज कई तरह से खंडित हो रहा है, जहां सोशल मीडिया पर हजारों ‘फ्रेंड्स’ होने के बावजूद, वास्तविक जीवन में अंतिम यात्रा में कंधा देने वाले सच्चे साथी विरल होते जा रहे हैं।



 बीते कुछ वर्षों में यह एक चिंताजनक प्रवृत्ति बनकर उभरी है। समय की कमी, व्यस्तता, या फिर सिर्फ औपचारिकता का बोझ- ये सब ऐसे कारण बन गए हैं जो हमें मानवता के सबसे बुनियादी कर्तव्य से दूर कर रहे हैं। यहां यह सोचने की आवश्यकता है कि क्या हम जाने-अनजाने में संवेदनाओं और रिश्तों की गठरी को ही लापरवाही की अग्नि में झोंक रहे हैं?  सबके मूल में एक और गहरी चिंता निहित है : भावी पीढ़ी को हम किस विरासत में देकर जा रहे हैं? यदि बच्चे बचपन से ही पितरों का स्मरण, श्राद्ध की महत्ता और सामाजिक सहयोग के इन रीति-रिवाजों से अनभिज्ञ रहेंगे, तो वे समाज में रिश्तों के गहरे महत्व को कैसे समझ पाएंगे?



 आज जो सामाजिक विखंडन और भाईचारे का अकाल हम देख रहे हैं, उसकी जड़ें इन्हीं टूटते बंधनों में हैं। अगर युवा बुजुर्गों के मार्गदर्शन से वंचित रहेंगे, तो आने वाले समय में उनमें सामाजिक संवेदनशीलता का अभाव होगा। एक सभ्य और मजबूत समाज का निर्माण तभी संभव है जब हम रिश्तों की गरिमा और सामाजिक कर्तव्यों के प्रति निष्ठा को बचाए रखें। अन्यथा, हमें भविष्य में और भी गहरी सामाजिक समस्याओं का सामना करना पड़ेगा। 

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