हे एक्यूआई तुझे परेशानी समझ नहीं आई!
- ललिता जोशी
एयर इंडेक्स क्वालिटी यानि ए क्यू आई। ये एक्यूआई? सर्दियाँ शुरू होते ही देश में एक्यूआई का हल्ला शुरू हो जाता है। इस कारण से देश का दिल दिल्ली सबसे ज्यादा हिल जाता है । हम विश्व की चौथी अर्थव्यवस्था बन चुके हैं। इस चौथी अर्थव्यवस्था की खराब एक्यूआई में हम अव्वल दर्जे पर हैं। इस कारण से फिज़ाओं में धुआं, साँसों में घुटन, आँखों में जलन ये है हमारी सर्दियाँ वो भी दिल्ली की । देश की राजधानी दिल्ली में कुछ कम क्यों हो भाई । वर्ल्ड क्लास दिल्ली में एक्यूआई भी बेहद खराब स्तर पर जा चुका है । बढ़िया बात है की एक्यूआई की निकृष्टता में हम विशिष्ट उत्कृष्टता प्राप्त है । इसके लिए दिल्ली माने देश की राजधानी अपनी पीठ तो थपथपा सकती है । चलो कहीं तो आला दर्जे पर हैं हम। बहुत किस्म की पाबन्दियाँ लग जाती इसे सुधारने में ।
सबसे पहले तो बच्चों की सेहत से फिक्रमंद मंत्री महोदय के निर्देश पर प्रशासनस्कूल बंद करवा देता है । हो गई कर्तव्य की इतिश्री । बेचारे बच्चे घर में बंद नौकरीपेशे वाले अभिभावक परेशान कैसे करें बच्चों का घर पर इंतज़ाम ? फिर शुरू हो जाता है उनकी ऑनलाइन क्लासों का दौर । एक ओर तो बच्चों से उनके मोबाइल का एडिक्शन छुड़वाने की बात की जाती है तो दूसरी ओर ऑनलाइन क्लासों की भरमार ।
एक तरफ प्रदूषण के कारण बदतर एक्यूआई दूसरी तरफ मोबाइल के कारण बच्चों की सेहत पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ रहा है । एक तरफ कुआं दूसरी तरफ खाई । जाएँ तो कहाँ जाएँ । ये तो ऐसे हुआ जैसे कि आसमान से गिरे खजूर पर अटके । सीनियर सिटिज़न को भी हिदायत दे दी जाती है कि वो घरों से बाहर न निकलें क्योंकि उनके स्वास्थ्य पर इसका बुरा असर पड़ता है । घरों से बाहर निकलें तो मास्क पहनकर । लगता है कोरोना अपनी छाप छोड़ ही गया है
मजे की बात तो ये है कि दिल्ली जो देश की राजधानी है यहाँ पर देश के प्रथम नागरिक से लेकर आम व्यक्ति तक रहते हैं । न जाने कितनी ही यहाँ देश-विदेश से विशिष्ट अतिथि आते हैं और यहीं पर हमारे लोकतन्त्र के मंदिर न जाने कितने ही अहम फैसले लिए जाते हैं । देश के विकास के लिए और उसे विश्व की प्रभावशाली अर्थव्यवस्था बनाने के लिए । लेकिन प्रदूषण के कारण खराब एक्यूआई को नियंत्रित करने में बेबसी और लाचारी दिखाई पड़ती है सरकारों की ।
प्रदूषण के लिए कभी डीजल को कलंकित किया जाता है तो कभी पुरानी गाड़ियों पर दोषारोपण किया । इन्हें प्रतिबंधित भी किया गया लेकिन समस्या जस की तस बनी रही । सी एन जी का प्रयोग गाड़ियों में किया जाने लगा इस से भी ए क्यू आई काबू में नहीं आया । कभी पड़ोसी राज्यों में जलाई जाने वाली पराली को कठघरे में खड़ा किया गया । पराली का मौसम जाने के बाद भी ये ए क्यू आई ठीट आदमी की तरह मुंह चिढ़ाता नज़र आता है ।
अब सरकारें एक्यूआई से निपटने के लिए इलेक्ट्रिक वेहिकल को बढ़ावा दे रही है । इन्हें लोकप्रिय बनाने के लिए सरकार इनकी दरों में रियायत दे रही है । इतना सब कुछ करने और होने पर भी एक्यूआई है आउट ऑफ कंट्रोल । अरे इतना सब कुछ होने पर भी हालत पर नियंत्रण हो ही नहीं पा रहा है । इसके मूल में जाना होगा । मूल में भूल है तभी तो एक्यूआई सर्दियाँ आते ही द्रुत गति से दौड़ने लगता है । स्मोग टावर फ़ेल हो गये । क्लाउड सीडिंग पर करोड़ो रुपये बेकार गए । इसीलिए मूल कारण को पकड़ना होगा।
बढ़ती जनसंख्या और उसके कारण बढ़ता कचरा और कचरे का निपटान सही तरीके से नहीं करना भी एक कारण है । प्राय ये देखा गया है कि इससे सड़कों पर वाहनों की संख्या में भी अंधाधुंध बढ़ोतरी हो रही है । एक सरकार ने गाड़ियों पर ऑड और इवन नंबर की पाबन्दियाँ लगाई लेकिन ए क्यू आई है की मानता ही नहीं । इतना ही नहीं कचरे को भी जलाया जाता है । इससे एक्यूआई की गुणवत्ता खराब हो जाती है ।
मजे की बात है कि एक्यूआई से लोग भागकर कर पहाड़ों का रुख करते हैं लेकिन बढ़ती भीड़ ने वहाँ का एक्यूआई भी गड़बड़ा दिया। अजी जनसंख्या को नियंत्रित करना होगा तभी तो बहुत सी समस्याओं का समाधान निकलेगा । अजी हमारी राजनीतिक पार्टियां इस पर बात करने से बचती हैं क्योंकि उन्हें चुनाव जीतना है। इतिहास गवाह है जिस दल ने इस मुद्दे पर कार्य किया उसको मुंह की खानी पड़ी । आज अपने यहाँ राजनीतिक दल मुफ्त का चंदन घिस मेरे नंदन की नीति पर चल रहे हैं और अपनी विजय पताका लहरा रहे हैं । तो फिर चिंता किस बात की करें । ए क्यू कहीं भी पहुंचे उनकी बला से । वैसे एक बात और है कि हमारे नेतागण विदेशों में स्टडी टूर के लिए जाते ही रहते हैं लेकिन वहाँ पर ए क्यू आई अपनी हद पार ही नहीं करता वो कैसे ? ये क्यों नहीं सीख कर आते कि यहाँ पर इसे कैसे नियंत्रण में रखे ?
एक्यूआई की खराब गुणवत्ता के कारण वो लोग विदेशों का रुख कर लेते हैं जो धनवान हैं । लेकिन आम आदमी का क्या वो तो शायद पैदा ही प्रतिकूल परिस्तिथियों का सामना करने और उन्हें झेलने के लिए । जब स्वच्छ हवा और पानी के लिए सड़कों पर उतरे तो उन्हें सरकार का कोपभाजन बनना पड़ा । महंगाई, बेरोजगारी, शिक्षा और खराब एक्यूआई और उसके कारण स्वास्थ्य समस्याओं से त्रस्त आम आदमी जाए तो जाए कहाँ । हे एक्यूआई तुझे भी आम जन की परेशानी समझ नहीं आई।
(मुनिरका एंक्लेव, दिल्ली)





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