हमें प्रेरणा लेने और आगे बढ़ने की जरूरत

राजीव त्यागी 

गणतंत्र के बारे में कहा जाता है कि वह सौ सालों में साकार होता है। भारत ने इस यात्रा की भी काफी यात्रा पूरी कर ली है। बावजूद इसके हमें डा. राममनोहर लोहिया की यह बात ध्यान रखनी होगी कि ‘लोकराज लोकलाज से चलता है।’ इसी के साथ याद आते हैं पं. दीनदयाल उपाध्याय जैसे लोग, जिन्होंने एकात्म मानववाद का दर्शन देकर भारतीय राजनीति को एक ऐसी दृष्टि दी है, जिसमें आम आदमी के लिए जगह है। यह दर्शन हमें दरिद्रनारायण की सेवा की मार्ग पर प्रशस्त करता है। महात्मा गांधी भी अंतिम व्यक्ति का विचार करते हुए उसके लिए इस तंत्र में जगह बनाने की बात करते हैं। 

हमें सोचना होगा कि गणतंत्र के इन वर्षों में उस आखिरी आदमी के लिए हम कितनी जगह और कितनी संवेदना बना पाए हैं। प्रगति और विकास के सूचकांक तभी सार्थक हैं, जब वे आम आदमी के चेहरे पर मुस्कान लाने में समर्थ हों। क्या ऐसा कुछ बताने और कहने के लिए हमारे पास है? यदि नहीं...तो अभी भी समय है भारत को महाशक्ति बनाना है, तो वह हर भारतीय की भागीदारी से ही सच होने वाला सपना है। देश के तमाम वंचित लोगों को छोड़कर हम अपने सपनों को सच नहीं कर सकते। क्या हम इस जिम्मेदारी को उठाने के लिए तैयार हैं।



गणतंत्र दिवस इन तमाम सवालों के जवाब खोजने की एक बड़ी जिम्मेदारी भी लेकर आया है। बीते समय में आतंकवाद, नक्सलवाद, क्षेत्रीयता की तमाम गंभीर चुनौतियों के सामने हमारा तंत्र बहुत बेबस दिखा। बावजूद इसके लोकतंत्र में जनता की आस्था बची और बनी हुयी है। हमारी एकता को तोड़ने और मन को तोड़ने के तमाम प्रयासों के बावजूद आम हिंदुस्तानी अपनी समूची निष्ठा से इस देश को एक देखना चाहता है। यह संकल्प लेना होगा कि हम लोकतंत्र में लोगों के भरोसे को जगा पाएं। उनकी उम्मीदों पर अवसाद की परतें न चढ़ने दें। सपनों में रंग भरने की हिम्मत, ताकत और जोश से भरा हो- आम हिंदुस्तानी तो इसी सपने को सच होते हुए देखना चाहता है। 

यह संयोग ही है कि नया साल और गणतंत्र दिवस हम एक ही महीने जनवरी में मनाते हैं। जाहिर तौर पर हर नए साल का मतलब कलैंडर का बदलना भर नहीं है वह उत्सव है संकल्प का, अपने गणतंत्र में तेज भरने का। आम आदमी में जो भरोसा टूटता दिखता है उसे जोड़ने का। गणतंत्र को तोड़ने या कमजोर करने में लगी ताकतों के मंसूबों पर पानी फेरने का। जनवरी का महीना इसीलिए बहुत खास है क्योंकि यह महीना देश की अस्मिता को पहली बार झकझोर कर जगाने वाले सन्यासी विवेकानंद की जन्मतिथि( 12 जनवरी) का महीना है। जिन्होंने पहली बार भारत के दर्शन को विश्वमंच पर मान्यता ही नहीं दिलायी हमारे दबे-कुचले आत्मविश्वास को जागृत किया। यह महीना है नेताजी सुभाष चंद्र बोस के जन्मदिन ( 23 जनवरी) का जिन्होंने विदेशी सत्ता के दांत खट्टे कर दिए और विदेशी भूमि पर भारतीयों के सम्मान की रक्षा के लिए अपनी सेना खड़ी की। 


जाहिर तौर पर यह महीना सही संकल्पों और महानायकों की याद का महीना है। इससे हमें प्रेरणा लेने और आगे बढ़ने की जरूरत है। नए साल का सूरज हमें एक नयी रोशनी दे रहा है उसका उजास हमें नई दृष्टि दे रहा है। क्या हम इस रोशनी से सबक लेकर, अपने महानायकों की याद को बचाने और देश को महाशक्ति बनाने के सपने के साथ खड़ा होने का हौसला दिखाएंगें?

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