अब ‘नैतिक एआई’
इलमा अज़ीम
मनुष्य अब केवल सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक पहचान तक सीमित नहीं है, उसकी एक डिजिटल पहचान भी है। यह पहचान, यह डेटा अब उसकी प्रतिष्ठा, निजता और स्वतंत्रता का हिस्सा है। इसे सुरक्षित रखना, इसका दुरुपयोग रोकना और डेटा पर नियंत्रण का अधिकार देना अब आधुनिक मानवाधिकारों का अनिवार्य तत्व है।
यदि डिजिटल गरिमा सुरक्षित नहीं, तो संपूर्ण मानवीय गरिमा अधूरी है। एआई की शक्ति का दूसरा आयाम इसकी सीखने और निर्णय लेने की क्षमता है, परंतु निर्णय वहीं तक उचित हैं, जहां तक वे मानवीय मूल्यों से नियंत्रित रहें। इसलिए विश्वभर में ‘नैतिक एआई’ की अवधारणा उभर रही है। स्वास्थ्य जगत में एआई का योगदान मानवाधिकारों की प्रकृति को बदलने की क्षमता रखता है।
दूरस्थ क्षेत्रों में चिकित्सा सहायता, रोगों की शीघ्र पहचान, व्यक्तिगत उपचार पद्धति और आपात स्थितियों में तेज निर्णय, ये सब केवल तकनीकी उपलब्धियां नहीं, बल्कि जीवन के अधिकार की प्रत्यक्ष अभिव्यक्ति हैं। जब मशीनें रोग के पैटर्न पहचानकर डॉक्टरों को निर्णय लेने में सहायता करती हैं, तब मानव जीवन अधिक सुरक्षित, अधिक संरक्षित और अधिक सम्माननीय बनता है। शिक्षा के क्षेत्र में भी एआई मानवाधिकारों की नई परिभाषा गढ़ रही है। शिक्षा अब एक-सा मॉडल नहीं रही, वह व्यक्तिगत बन रही है।
प्रत्येक विद्यार्थी की क्षमता, रुचि और सीखने की गति के अनुसार ज्ञान-संरचना बन रही है। यह समानता का वह रूप है, जिसकी कल्पना समाज सुधारकों ने सदियों पहले की थी—ऐसी शिक्षा, जिसमें कोई पीछे न रह जाए। आर्थिक अवसरों की दृष्टि से भी एआई ने मानवीय अधिकारों का आयाम विस्तृत किया है।
यह सत्य है कि तकनीक कुछ पारंपरिक रोजगारों को अप्रासंगिक बना रही है, पर यह आधा सत्य है। एआई नए कौशल, नए रोजगार, नए व्यवसाय और नए बाजारों को भी जन्म दे रही है। यही स्थिति शासन के क्षेत्र में भी दिखाई देती है। सरकारें अब नागरिकों की जरूरतें समझने, पूर्वानुमान करने व त्वरित समाधान देने में सक्षम हो रही हैं।





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