- कृति आरके जैन
जब इतिहास अपने पन्ने पलटता है, तो कुछ वर्ष केवल तारीख नहीं रहते, वे चेतना बन जाते हैं। वर्ष 2026 ऐसा ही एक कालखंड है, जहां भारतीय नारी की पहचान “अबला” की परिधि तोड़कर “सबला, सक्षम और निर्णायक शक्ति” के रूप में स्थापित हो रही है। अब प्रश्न यह नहीं कि स्त्री क्या कर सकती है, प्रश्न यह है कि बिना स्त्री के क्या संभव है? यह परिवर्तन अचानक नहीं, बल्कि सदियों की चुप्पी, संघर्ष और आत्मचेतना से उपजा हुआ है। आज महिला दया या सहानुभूति की नहीं, अधिकार, अवसर और नेतृत्व की भाषा बोल रही है। वह केवल बदलाव का हिस्सा नहीं, बल्कि बदलाव की धुरी बन चुकी है। यही युगांतकारी बदलाव 2026 को नारी चेतना का स्वर्णिम अध्याय बनाता है।
भारतीय समाज में लंबे समय तक स्त्री को त्याग, सहनशीलता और मौन की प्रतिमूर्ति माना गया। परंतु समय के साथ उसने प्रश्न पूछना सीखा, निर्णय लेना सीखा और अपनी पहचान स्वयं गढ़ी। शिक्षा के विस्तार, सामाजिक आंदोलनों और नीतिगत प्रयासों ने उसे नई दृष्टि दी। अब वह परिवार की सीमाओं तक सीमित नहीं, बल्कि समाज की दिशा तय करने वाली शक्ति है। 2026 तक आते-आते महिला आत्मनिर्भरता केवल आर्थिक नहीं, वैचारिक भी बन चुकी है। वह परंपरा और आधुनिकता के बीच संतुलन साधते हुए अपने लिए नए रास्ते बना रही है। यही संतुलन उसे विशिष्ट, प्रभावशाली और प्रेरणादायी बनाता है।
पिछले वर्षों में महिलाओं की श्रम भागीदारी और निर्णयात्मक भूमिकाओं में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। यह परिवर्तन आंकड़ों से अधिक मानसिकता का द्योतक है। आज महिलाएं नौकरी खोजने वाली नहीं, रोजगार देने वाली बन रही हैं। वे नेतृत्व, प्रबंधन और नवाचार के क्षेत्र में नई मिसालें गढ़ रही हैं। आत्मनिर्भरता ने उन्हें आत्मविश्वास दिया है, और आत्मविश्वास ने समाज में उनकी स्वीकार्यता बढ़ाई है। 2026 की महिला आर्थिक इकाई नहीं, बल्कि आर्थिक दिशा निर्धारित करने वाली शक्ति है। वह घर की अर्थव्यवस्था से लेकर राष्ट्र की विकास नीति तक अपनी स्पष्ट छाप छोड़ रही है।
खेल जगत में भारतीय महिलाओं ने जिस प्रकार सीमाओं को ध्वस्त किया है, वह नई पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बन गया है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर विजयों ने यह सिद्ध कर दिया कि प्रतिभा लिंग नहीं देखती। साहस, अनुशासन और समर्पण के बल पर महिला खिलाड़ी असंभव को संभव कर रही हैं। उनकी सफलता केवल पदकों तक सीमित नहीं, बल्कि सामाजिक सोच में परिवर्तन का माध्यम है। खेल ने उन्हें आत्मविश्वास, नेतृत्व और मानसिक दृढ़ता दी है। आज खेल केवल प्रतिस्पर्धा नहीं, बल्कि सशक्तिकरण का विद्यालय बन चुका है, जहां से आत्मबल से भरी पीढ़ियां निकल रही हैं।
उद्यमिता के क्षेत्र में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी भारत की आर्थिक संरचना को नया आकार दे रही है। छोटे गांवों से लेकर महानगरों तक महिलाएं स्टार्टअप, स्वसहाय समूह और नवाचार आधारित व्यवसाय खड़े कर रही हैं। डिजिटल प्लेटफॉर्म, वित्तीय समावेशन और प्रशिक्षण ने उन्हें नई उड़ान दी है। वे केवल लाभ नहीं, बल्कि सामाजिक उत्तरदायित्व को भी प्राथमिकता दे रही हैं। महिला उद्यमी रोजगार सृजन के साथ संवेदनशील नेतृत्व प्रस्तुत कर रही हैं। यह बदलाव दर्शाता है कि जब स्त्री आर्थिक रूप से सशक्त होती है, तो पूरा परिवार और समाज स्थिरता तथा प्रगति की दिशा में आगे बढ़ता है।
राजनीति में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी लोकतंत्र को अधिक मानवीय और संतुलित बना रही है। पंचायत से संसद तक उनकी उपस्थिति ने यह प्रमाणित किया है कि नेतृत्व केवल शक्ति का नहीं, समझ का विषय है। नीति निर्माण में महिलाओं की सहभागिता से शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक न्याय जैसे विषयों को प्राथमिकता मिली है। आरक्षण और प्रतिनिधित्व ने नई पीढ़ी को राजनीति से जुड़ने का साहस दिया है। 2026 का भारत उस दौर में प्रवेश कर रहा है, जहां सत्ता का स्वर अधिक संवेदनशील, समावेशी और उत्तरदायी होता जा रहा है। यह परिवर्तन लोकतंत्र की आत्मा को सुदृढ़ करता है।
शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में महिलाओं की प्रगति समाज के भविष्य को दिशा दे रही है। विज्ञान, तकनीक और अनुसंधान में बढ़ती भागीदारी यह दर्शाती है कि बौद्धिक क्षमताएं किसी लिंग की मोहताज नहीं। स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता, स्वच्छता अभियान और मानसिक स्वास्थ्य पर खुला संवाद महिलाओं को अधिक सशक्त बना रहा है। शिक्षित और स्वस्थ महिला ही सशक्त पीढ़ी की निर्माता होती है। वह बच्चों में मूल्य, समाज में संवेदना और राष्ट्र में विवेक भरती है। यही कारण है कि महिला सशक्तिकरण को विकास की रीढ़ माना जाने लगा है।
यद्यपि प्रगति के पथ पर कई उपलब्धियां हैं, फिर भी चुनौतियां शेष हैं। घरेलू हिंसा, असमान वेतन, साइबर अपराध और सामाजिक भेदभाव जैसी समस्याएं अब भी मौजूद हैं। किंतु अब महिलाएं चुप नहीं रहतीं, वे संगठित होकर आवाज उठाती हैं। कानून, जागरूकता और सामुदायिक सहयोग उनके संघर्ष को शक्ति दे रहे हैं। आत्मरक्षा, डिजिटल साक्षरता और अधिकारों की समझ ने उन्हें अधिक सजग बनाया है। यह संघर्ष पराजय का नहीं, परिवर्तन का संकेत है, जो समाज को अधिक न्यायपूर्ण और सुरक्षित बनाने की दिशा में अग्रसर है।
2026 की महिला केवल अपनी उन्नति तक सीमित नहीं, वह राष्ट्र निर्माण की सहभागी है। नारी शक्ति वंदन जैसे प्रयास इस बदलाव को संस्थागत आधार देते हैं। आज महिला नेतृत्व केवल प्रतीक नहीं, प्रेरणा है। वह नीति, नवाचार और नैतिकता का संतुलन स्थापित कर रही है। जब महिलाएं आगे बढ़ती हैं, तो विकास की परिभाषा विस्तृत होती है। यह समय है जब समाज स्त्री को सहयोग नहीं, साझेदारी दे। क्योंकि सशक्त महिला ही सशक्त राष्ट्र की नींव रखती है, और यही आधुनिक भारत की पहचान बन रही है।
महिलाओं की यह यात्रा केवल परिवर्तन की कहानी नहीं, चेतना के पुनर्जागरण का घोष है। यह बताती है कि सशक्तिकरण कोई उपहार नहीं, बल्कि अधिकार है, जिसे जागरूकता और अवसर से प्राप्त किया जाता है। 2026 हमें यह स्मरण कराता है कि जब स्त्री आगे बढ़ती है, तो समाज स्थिर नहीं रहता, वह ऊँचाइयों की ओर अग्रसर होता है। आइए, हम सब मिलकर ऐसा वातावरण बनाएं जहां हर महिला भय नहीं, विश्वास के साथ सपने देख सके। यही सच्चा विकास है, यही समावेशी भारत का उज्ज्वल भविष्य।
(लेखिका बड़वानी, मप्र)





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