- मनीषा मंजरी
शरद ऋतु की ठंड को तोड़कर, बसंत का अपनी बाहों को फैलाना। ये सिर्फ ऋतु - परिवर्तन नहीं है। ये परिवर्तन मनुष्य के भीतर जमी हुई ठण्ड को तोड़कर, उसकी संवेदनाओं में नए रंग भरने का समय है। जब बसंत आता है तो सिर्फ प्रकृति हीं नहीं बल्कि स्त्री भी मुस्कुरा उठती है। यह मुस्कुराहट सिर्फ उसके चेहरे पर नहीं झलकती बल्कि उसकी आत्मा की खुशी को भी दर्शाती है, उसके जो सृजन, सौंदर्य, स्वतंत्रता और चेतना से उपजती है। बसंत पंचमी उस चेतना का पर्व है जहां पीले रंग की आभा में स्त्री के अनेक रूप खिल उठते हैं।
बसंत पंचमी और स्त्री-चेतना
बसंत पंचमी को विद्या, कला और विवेक की देवी माँ सरस्वती की आराधना के पर्व के रूप में मनाया जाता है। यह कोई संयोग तो नहीं है कि ज्ञान और सृजन की अधिष्ठात्री एक स्त्री रूप में पूजी जाती हैं। यह त्योहार हमें याद दिलाता है कि स्त्री केवल जीवन की वाहक नहीं, बल्कि विचारों और मूल्यों की भी जननी भी है। बसंत पंचमी उस स्त्री-चेतना का उत्सव है, जहाँ सौंदर्य और बौद्धिकता एक-दूसरे के पूरक बनते हैं।
किशोरी: सपनों की पहली उड़ान
किशोरी स्त्री के जीवन में बसंत पंचमी पहली उड़ान के संकेत के रूप में प्रविष्ट होती है। उसके लिए ये त्योहार नई किताबों, नये कपड़ों, और सपनों के पहले रंग की भांति होता है। पीले फूलों की तरह उसके भीतर भी जिज्ञासाएं खिलती हैं इस संसार को जानने, समझने, और अपनी पहचान गढ़ने की। ये समाज यूँ तो उसकी राहों में कई प्रकार की सीमायें खींच देता है, पर ये बसंत उसकी आँखों में विश्वास के बीज बोता है। वो सीखती है की सौंदर्य सिर्फ सजावट नहीं आत्मविश्वास भी है।
माँ: त्याग के बीच खिलती आशा
माँ के रूप में स्त्री के जीवन में बसंत का अर्थ और गहरा हो जाता है। उसके लिए बसंत पंचमी केवल पूजा का दिन नहीं, बल्कि जीवन को फिर से संवारने का अवसर होता है। रसोई में पकते पीले व्यंजनों के बीच वह अपने बच्चों के भविष्य के लिए प्रार्थना करती है। उसकी मुस्कान में थकान छुपी होती है, पर हार नहीं। वह जानती है कि जैसे प्रकृति हर वर्ष खुद को नया करती है, वैसे ही जीवन भी कठिनाइयों के बाद उजास देती है।
लेखिका: शब्दों का बसंत
लेखिका के लिए बसंत पंचमी आत्मिक संवाद का त्योहार है। यह वह दिन है जब उसकी कलम और चेतना के बीच का रिश्ता और भी गहरा हो जाता है। वह माँ सरस्वती से केवल प्रसिद्धि नहीं, बल्कि संवेदनशील दृष्टि माँगती है। ऐसे शब्द मांगती है, जो समाज के मौन को तोड़ सके, अनकही पीड़ा की आवाज बन सकें। जब बसंत आता है, तो उसकी लेखनी मुस्कुराती है, क्योंकि सृजन उसके लिए प्रतिरोध और परिवर्तन दोनों हीं है।
किसान स्त्री: धरती की धड़कन
किसान स्त्री के बिना बसंत की कल्पना अधूरी है। खेतों में लहलहाती फसल के पीछे किसान स्त्री का मौन श्रम छुपा होता है। उसके हाथों में मिट्टी की गंध और आँखों में मौसम की समझ होती है। बसंत पंचमी उसके लिए राहत का संकेत होती है, जब ठंड के बाद धरती फिर से साँस लेने लगती है। उसकी मुस्कान में संतोष भी होता है और चिंता भी, पर वह जानती है कि प्रकृति की तरह स्त्री भी हर बार खुद को फिर से रच सकती है।
पीला रंग: सौंदर्य नहीं, आशा
बसंत पंचमी का ये पीला रंग केवल परिधान का नहीं, यह आशा का रंग है, जो अंधकार के बीच भी उजास चुनने की हिम्मत देता है। यह रंग स्त्री को उसकी रचनात्मक शक्ति से जोड़ता है, चाहे वह घर में हो, खेत में, कक्षा में या लेखन की मेज़ पर। बसंत पंचमी स्त्री को यह याद दिलाती है कि सौंदर्य का अर्थ केवल बाहरी नहीं होता। यह आत्मस्वीकृति, आत्मसम्मान और स्वतंत्र सोच में भी बसता है।
आज जब स्त्री लगातार अपने अधिकार, सम्मान और पहचान के लिए संघर्ष कर रही है, ऐसे में बसंत पंचमी एक सांस्कृतिक आश्वासन की तरह आती है। यह कहती है कि बदलाव संभव है, कि कोमलता कमजोरी नहीं होती, और कि सृजन सबसे बड़ी शक्ति है। यह त्यौहार स्त्री को उसके भीतर छिपे उजास से जोड़ती है। जब बसंत आता है, तो स्त्री मुस्कुराती है, क्योंकि वह जानती है कि हर ठंड के बाद फूल खिलते हैं, और हर मौन के बाद आवाज़ जन्म लेती है। बसंत पंचमी उसी मुस्कान का उत्सव है, जो पीड़ा से गुजरकर भी उम्मीद नहीं छोड़ती। और यही स्त्री की सबसे बड़ी पहचान है।
स्त्री और बसंत दोनों हमें सिखाते हैं कि परिवर्तन जीवन का स्वभाव है। हर ठंड के बाद हरियाली लौटती है, और हर संघर्ष के बाद स्त्री स्वयं को नए अर्थों में गढ़ती है। बसंत पंचमी उसी सतत पुनर्जन्म की स्मृति है।





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