जागरूकता जरूरी
इलमा अज़ीम
हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था में मजबूत सरकार का होना कतई चिंता की बात नहीं है, पर विपक्ष का इतना कमजोर हो जाना निश्चित रूप से चिंता की बात होनी चाहिए। अच्छा और मजबूत होने का अहसास ग़लत नहीं है, पर यह मज़बूती यदि घमंड में बदल जाती है तो इसे सही नहीं कहा जा सकता। सही नहीं होने का यह खतरा आज हमारे जनतंत्र पर मंडरा रहा है। ऐसा नहीं है कि ऐसी स्थितियां पहले कभी नहीं बनीं। राज्यों में भी ऐसा हो चुका है, और केंद्र में भी। पर गंभीरता से विचार करने का एक मुद्दा और भी है, और उसका सीधा रिश्ता हमारे जनतंत्र के भविष्य से है।
हमारी जनतांत्रिक व्यवस्था में मजबूत सरकार का होना कतई चिंता की बात नहीं है, पर विपक्ष का इतना कमजोर हो जाना निश्चित रूप से चिंता की बात होनी चाहिए। अच्छा और मजबूत होने का अहसास ग़लत नहीं है, पर यह मज़बूती यदि घमंड में बदल जाती है तो इसे सही नहीं कहा जा सकता। सही नहीं होने का यह खतरा आज हमारे जनतंत्र पर मंडरा रहा है। ऐसा नहीं है कि ऐसी स्थितियां पहले कभी नहीं बनीं। राज्यों में भी ऐसा हो चुका है, और केंद्र में भी। पर गंभीरता से विचार करने का एक मुद्दा और भी है, और उसका सीधा रिश्ता हमारे जनतंत्र के भविष्य से है।
जनतंत्र को जनता की, जनता द्वारा और जनता के लिए सरकार कहा जाता है। यदि किसी नेता को यह भ्रम होने लगे कि वह सेवक नहीं, मालिक है तो यह एक तरह से जनतंत्र को नकारना ही होगा। ऐसा व्यक्ति बड़ी आसानी से निरंकुश हो सकता है, और यह स्थिति किसी भी दृष्टि से स्वीकार्य नहीं है, स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए।
ऐसे व्यक्ति पर जनता का अंकुश ज़रूरी है, और ऐसा व्यक्ति कभी भी अंकुश स्वीकार करना नहीं चाहेगा! इसलिए जनतंत्र में विपक्ष का मज़बूत होना ज़रूरी माना जाता है। देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू के समय में एक बार संसद में विपक्ष बहुत कमज़ोर हो गया था। तब उन्होंने सदन में कांग्रेसी सदस्यों से कहा था कि वे सरकार के काम-काज पर निगाह रखें, ताकि सरकार या प्रधानमंत्री निरंकुश न हो जाये। यह निरंकुशता चुनावी तानाशाही तक ले जा सकती है। आज दुनिया के कई देशों में यह प्रवृत्ति पनप रही है। जनतांत्रिक मूल्यों-आदर्शों का तकाज़ा है कि इस प्रवृत्ति को रोका जाये। इसलिए बात फिर मतदाता की जागरूकता पर आकर टिकती है। सतत जागरूकता पर।




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