ताइवान को दूसरा यूक्रेन बनाने की तैयारी
- संजीव ठाकुर
दुनिया आज एक ऐसे दौर से गुजर रही है जहाँ वैश्विक शक्ति-संतुलन तेजी से बदल रहा है, और इसी शक्ति संघर्ष के केंद्र में ताइवान खड़ा है, जिसे अमेरिका और चीन के बीच तनाव की धुरी माना जाने लगा है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने विश्व को यह दिखा दिया है कि महाशक्तियों के भू-राजनीतिक खेल में छोटे देश किस तरह तबाह हो जाते हैं, और अब यही खतरा ताइवान के सिर पर मंडरा रहा है।
अमेरिका द्वारा ताइवान को लगातार सैन्य, राजनीतिक और कूटनीतिक रूप से प्रोत्साहित किया जा रहा है, ठीक उसी तरह जैसे यूक्रेन को रूस के विरुद्ध भड़काया गया था। इतिहास गवाह है कि अमेरिका जिस देश का समर्थन करता है, वह अंततः संकट की कगार पर पहुंच जाता है और अफगानिस्तान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ तालिबानी आतंकवाद के खिलाफ निर्णायक संघर्ष के समय अमेरिका ने रातों-रात सेना वापस बुलाकर अफगानिस्तान को अराजकता और खूनी सत्ता-परिवर्तन के हवाले कर दिया। यूक्रेन को रूस के विरुद्ध खड़ा करने का परिणाम दुनिया देख चुकी है—अरबों का नुकसान, लाखों निर्दोष लोगों की मौतें, शहरों का मलबा, और युद्ध का अंत आज तक नहीं। अमेरिका और नाटो के राष्ट्र बाहर बैठकर तमाशबीन बने रहे, हथियार बेचे, राजनीति चमकाई, पर जमीन पर कोई निर्णायक समर्थन नहीं दिया। अब ताइवान पर यही खेल दोहराया जा रहा है।
अमेरिका द्वारा ताइवान की संप्रभुता जैसी संवेदनशील विषय पर खुला समर्थन, “रणनीतिक अस्पष्टता” की नीति के बजाय स्पष्ट हस्तक्षेप का संकेत देता है। अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की स्पीकर नैंसी पेलोसी की ताइवान यात्रा, चीन की कड़ी चेतावनियों के बावजूद, अमेरिका की उस रणनीति को दर्शाती है जो चीन-विरोधी शक्ति संतुलन बनाने के लिए ताइवान को मोहरे की तरह इस्तेमाल कर रही है। चीन ने इस यात्रा को अपनी संप्रभुता में प्रत्यक्ष हस्तक्षेप बताया और सैन्य कार्रवाई की खुली धमकी दी, उसकी सेना ने ताइवान के चारों ओर लाइव-फायर सैन्य अभ्यास का ऐलान करते हुए युद्ध-स्तरीय तैयारी शुरू कर दी। नैंसी पेलोसी ने ताइवान पहुंचकर कहा कि 23 मिलियन ताइवानी लोगों की सुरक्षा की जिम्मेदारी अमेरिका की है। ऐसे बयान यूक्रेन युद्ध की शुरुआत से पहले अमेरिका द्वारा दिए गए बयानों जैसे ही प्रतीत होते हैं, जहाँ यूक्रेन को “पूर्ण समर्थन” का आश्वासन दिया गया, पर युद्ध शुरू होते ही अमेरिका ने सुरक्षित दूरी बना ली।
चीन 20 वर्ष पहले वाला देश नहीं। सैन्य, आर्थिक और सामरिक क्षमता में वह विश्व की शीर्ष तीन शक्तियों में है। रूस-यूक्रेन युद्ध में उसने रूस का समर्थन कर यह संकेत दिया कि वह पश्चिमी गठबंधन को चुनौती देने के लिए तैयार है। यदि चीन और अमेरिका के बीच ताइवान विवाद खुली लड़ाई में बदलता है, तो यह केवल स्थानीय संघर्ष नहीं होगा बल्कि तीसरे विश्व युद्ध की संभावना को जन्म दे सकता है। अमेरिका, यूरोप और नाटो यदि ताइवान के समर्थन में खड़े होते हैं और रूस चीन के साथ, तो विश्व युद्ध की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।
अब इस प्रसंग को भारत के संदर्भ से समझना अत्यंत आवश्यक है। भारत की भौगोलिक स्थिति, आर्थिक नीति, इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में उसकी सामरिक भूमिका और चीन के साथ उसके सीमा विवाद ने इस पूरे परिदृश्य को हमारे लिए अत्यंत संवेदनशील बना दिया है। भारत-चीन सीमा पर 2020 के गलवान संघर्ष के बाद दोनों देशों के बीच विश्वास पूरी तरह टूट चुका है। चीन पाकिस्तान के माध्यम से भारत को घेरने की नीति (CPEC, ग्वादर पोर्ट) पहले ही चला रहा है, और अब यदि ताइवान-संघर्ष बढ़ता है, तो चीन दक्षिण एशिया में सैन्य और रणनीतिक दबाव बढ़ा सकता है। ऐसे में भारत का अत्यंत सावधानी से कदम चुनना अनिवार्य है।
भारत QUAD का सदस्य है—जिसमें अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में चीन का संतुलन बनाने के लिए जुड़े हैं। यदि ताइवान में संघर्ष बढ़ता है, तो अमेरिका भारत से खुलकर समर्थन की अपेक्षा करेगा। पर भारत के लिए यह निर्णय आसान नहीं, क्योंकि चीन भारत का सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार भी है, और सीमा से सटे देशों में अस्थिरता भारत की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाएगी। यदि ताइवान युद्ध होता है, तो वैश्विक सेमीकंडक्टर सप्लाई चेन टूट जाएगी, जिसका सबसे बड़ा प्रभाव भारत की तकनीकी-आर्थिक व्यवस्था पर पड़ेगा। ताइवान विश्व का 65–70% चिप निर्माण नियंत्रित करता है। चिप-कंपनियों के ध्वस्त होने का मतलब—मोबाइल, कंप्यूटर, रक्षा इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटो-उद्योग, उपग्रह-तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और स्वास्थ्य उपकरणों का ठहर जाना। दुनिया की अर्थव्यवस्था घुटनों पर आ जाएगी।
भारत अभी सेमीकंडक्टर उत्पादन के राष्ट्रीय मिशन पर काम कर रहा है, पर युद्ध की स्थिति में यह प्रयास पर्याप्त सिद्ध नहीं होगा। ऊर्जा, ईंधन और आयात-निर्यात असंतुलन भी भारत को आर्थिक रूप से चुनौती देगा। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण भारत को कच्चा तेल, गैस और खाद्य-सामग्री के मूल्य वृद्धि का जोखिम झेलना पड़ा है—ताइवान युद्ध उसका कई गुना व्यापक प्रभाव ला सकता है।
भारत के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होगी कि क्या वह पश्चिमी दबाव में अमेरिका के पक्ष में खड़ा हो या अपनी कूटनीतिक स्वतंत्रता “रणनीतिक स्वायत्तता” को सुरक्षित रखे। भारत का हित युद्ध में नहीं, शांति में है। भारत वैश्विक मध्यस्थता की भूमिका निभाकर कूटनीतिक नेतृत्व दिखा सकता है। भारत ने रूस-यूक्रेन युद्ध में भी यही नीति अपनाई—न किसी का अंध समर्थन, न विरोध—केवल राष्ट्रहित।
आज विश्व को जरूरत युद्ध की नहीं, संवाद की है। यदि अमेरिका ताइवान को यूक्रेन की तरह मोहरे की तरह इस्तेमाल करता रहा और चीन के साथ उसकी प्रत्यक्ष भिड़ंत हुई, तो परिणाम पूरी मानवता के भविष्य को संकट में डाल देंगे। भारत को ऐसे समय में विश्व-राजनीति में संतुलनकारी भूमिका निभाने का अवसर भी है और दायित्व भी—क्योंकि भारत सभ्यता-आधारित शांतिपूर्ण विचारधारा का प्रतीक है।
दुनिया को चाहिए कि ताइवान को दूसरा यूक्रेन न बनने दे और महाशक्तियाँ अपने स्वार्थों के लिए छोटे देशों को युद्ध में न झोंकें। यदि कूटनीति विफल हुई, तो आने वाला समय मानव-इतिहास का सबसे खतरनाक अध्याय होगा। भारत को सावधानी, विवेक, स्वायत्त रणनीति और वैश्विक शांति-नेतृत्व का मार्ग चुनना होगा, क्योंकि ताइवान-संघर्ष केवल एशिया का नहीं, पूरी मानवता का संकट होगा।
(चिंतक, स्तंभकार, रायपुर, छत्तीसगढ़)






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